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जातिप्रथा - उन्मूलन

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उत्तर दे सकता हूं कि अल्स्टर और दक्षिणी आयरलैंड के बीच एक सामाजिक समस्या थी। कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच एक समस्या निश्चय ही जाति की समस्या थी। आयरलैंड में होम रूल एक प्रकार से रोम का शासन रूल होगा। अल्स्टरवासियों ने इसी रूप में अपना उत्तर तैयार किया था। किन्तु इस बात को बताने का यही एक अन्य तरीका है कि कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच जाति की सामाजिक समस्या थी, जिसने वहां राजनीतिक समस्या का हल नहीं होने दिया। इस साक्ष्य को फिर से चुनौती दिया जाना निश्चित है। यहां भी साम्राज्यवादी हाथ काम कर रहा था। किन्तु मेरे साधन समाप्त नहीं हुए हैं। मैं रोम के इतिहास से साक्ष्य दूंगा। यहां कोई भी यह नहीं कह सकता है कि कोई दुष्ट आत्मा काम कर रही थी। जिस किसी ने भी रोम के इतिहास का अध्ययन किया है, उसे पता होगा कि रोम के गणतंत्रवादी संविधान में सांप्रदायिक अधिनिर्णय से बहुत अधिक मिलते - जुलते तत्व थे। जब रोम में राजशाही का उन्मूलन हुआ तो राजसी सत्ता या परसत्ता (इम्पीरियम) कांसुलों और पोंटिफेक्स मेक्सिमस के बीच विभक्त हो गई थी। कांसुलों में राजा का धर्मनिरपेक्ष प्राधिकार निहित था, जब कि पोंटिफेक्स मेक्सिमस ने राजा का धार्मिक प्राधिकार ग्रहण किया था। इस गणतंत्रवादी संविधान ने दो कांसुलों का प्रावधान किया था। एक था पेट्रिशियन और दूसरा था प्लेबियन। उसी संविधान में पोंटिफेक्स मेक्सिमस के अधीन पादरियों की भी व्यवस्था थी, जिनमें से आधे प्लेबियन और आधे पेट्रिशियन होते थे। इसका क्या कारण है कि रोम के गणतंत्रवादी संविधान में ये प्रावधान थे जो कि, जैसा कि मैंने बताया था, सांप्रदायिक अधिनिर्णय के प्रावधानों से इतने अधिक मिलते हैं? इसका एक ही उत्तर मिल सकता है कि रोम गणतंत्र के संविधान को पेट्रिशियनों तथा प्लेबियनों के बीच सामाजिक विभाजन को ध्यान में रखना पड़ा था। पेट्रिशियन और प्लेबियन, ये दो स्पष्ट जातियां थीं। सार रूप में हम कह सकते हैं कि राजनीतिक सुधारकों को जिस दिशा में वे जाना चाहें, जाने दें। इससे उन्हें पता चलेगा कि संविधान तैयार करने में वे प्रचलित सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न समस्या की उपेक्षा नहीं कर सकते।

इस प्रस्ताव के समर्थन में कि सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का राजनीतिक संविधानों पर प्रभाव पड़ता है, मैंने जिन उदाहरणों को प्रस्तुत किया है, वे अधिक विस्तृत प्रतीत होते हैं। मैं समझता हूं कि ऐसा ही है। किन्तु यह नहीं मानना चाहिए एक का दूसरे पर पड़ने वाला प्रभाव सीमित होता है। दूसरी ओर, यह कहा जा सकता है कि इतिहास सामान्यतः इस प्रस्ताव को बदल देता है कि राजनीतिक क्रांतियां हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों के बाद हुई हैं। लूथर द्वारा आरंभ किया गया धार्मिक सुधार यूरोप के लोगों की राजनीतिक मुक्ति का अग्रदूत था। इंग्लैंड में प्यूरिटनवाद के कारण राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना हुई। प्यूरिटनवाद ने नए विश्व की स्थापना की।

प्यूरिटनवाद ही ने अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम को जीता। प्यूरिटनवाद एक धार्मिक आंदोलन था। यही बात मुस्लिम साम्राज्य के संबंध में सत्य है। अरबों के राजनीतिक