50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
सत्ता बनने से पहले वे पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा आरंभ संपूर्ण धार्मिक क्रांति से गुजरे थे। यहां तक कि भारतीय इतिहास भी उसी निष्कर्ष का समर्थन करता है। चन्द्रगुप्त द्वारा संचालित राजनीतिक क्रांति से पहले भगवान बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी। शिवाजी ने नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति भी महाराष्ट्र के संतों द्वारा किए गए धार्मिक और सामाजिक सुधारों के बाद हुई थी। सिखों की राजनीतिक क्रांति से पहले गुरु नानक द्वारा की गई धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी। यहां और अधिक दृष्टांत देना अनावश्यक है। इन दृष्टांतों से यह बात प्रकट हो जाएगी कि मन और आत्मा की मुक्ति जनता के राजनीतिक विस्तार के लिए पहली आवश्यकता है।
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अब मैं समाजवादियों की ओर आता हूं। क्या समाजवादी लोग सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न समस्या की उपेक्षा कर सकते हैं? भारत के समाजवादी यूरोप में अपने साथियों का अनुसरण करते हुए इतिहास की आर्थिक व्याख्या को भारत के तथ्यों पर लागू करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य एक आर्थिक प्राणी है। उसके कार्यकलाप और आकांक्षाएं आर्थिक तथ्यों से परिबद्ध और संपत्ति सत्ता का एकमात्र स्रोत है। इसलिए वे इस बात का प्रचार करते हैं कि राजनीतिक और सामाजिक सुधार केवल भारी भ्रम है और संपत्ति के समानीकरण द्वारा आर्थिक सुधारों को अन्य हर प्रकार के सुधारों से वरीयता दी जानी चाहिए। ऐसे विषयों में से प्रत्येक विषय पर कोई भी चर्चा कर सकता है कि समाजवादियों का यह सिद्धांत आर्थिक सुधार पर आधारित है और प्रत्येक प्रकार के सुधार पर वरीयता दी जानी चाहिएं। किसी की भी यह धारणा हो सकती है कि आर्थिक प्रेरणा ही मात्र ऐसी प्रेरणा नहीं है, जिससे व्यक्ति प्रेरित होता है। मानव समाज का कोई भी विद्यार्थी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकता कि आर्थिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है। किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर ही अक्सर शक्ति का स्रोत बन जाता है और उसके प्रभाव से उसका प्राधिकार प्रदर्शित होता है, जैसाकि महात्माओं का सामान्य व्यक्ति के ऊपर प्रभाव रहा है। भारत में लखपति लोग अकिंचन, साधुओं और फकीरों की आज्ञा क्यों मानते हैं? भारत में लाखों दरिद्र अपनी मामूली चीजों को भी जो उनकी एकमात्र संपत्ति होती है, बेचकर बनारस और मक्का क्यों जाते हैं? भारत के इतिहास में इस बात का चित्रण है कि धर्म सत्ता का स्रोत है, जहां पुजारी को सामान्य व्यक्ति से अधिक महत्व प्राप्त है और कभी - कभी तो यह प्रथम मजिस्ट्रेट से भी अधिक होता है। भारत में हर चीज, यहां तक कि हड़ताल और चुनाव पर भी आसानी से धर्म का प्रभाव पड़ता है और वह ऐसी घटनाओं को धार्मिक मोड़ दे देता है। व्यक्ति के ऊपर धर्म की शक्ति का एक और उदाहरण देने के लिए हम रोम के प्लेबियन का मामला लेते हैं। यह मामला इस मुद्दे पर व्यापक प्रकाश डालता है। प्लेब लोगों ने रोमन गणराज्य के अधीन सर्वेच्च कार्यकारी सत्ता में भागीदार होने के लिए लड़ाई लड़ी थी और उन्होंने प्लेबियनों की असेम्बली कोमिटिया सेंचूरियाटा द्वारा गठित पृथक