जातिप्रथा - उन्मूलन
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संवाद को सतत जारी रखकर ही अपने अस्तित्व को बनाए रखता है। मूर्तरूप से कहा जाए तो सिर्फ यही काफी नहीं है कि सभी लोग वैसे ही आचरण करें, जैसे अन्य लोग कर रहे हैं। अगर अलग - अलग लोग एक जैसा ही सब कुछ कर रहे हैं, तो भी उन्हें उसी समाज के अंग नहीं माना जा सकता। यह इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुओं की विभिन्न जातियों के लोग एक से ही त्यौहार मनाते हैं। लेकिन अलग - अलग जातियों द्वारा उन्हीं त्यौहार के मनाए जाते रहने के बावजूद वे एक समाज में नहीं बंध पाए हैं। इसके लिए यह अनिवार्य है कि सभी लोग किसी सामूहिक कार्य में इस प्रकार मिल - जुलकर बराबरी से हिस्सा लें या भागीदारी करें कि उन सभी में भी वे ही भाव हों जिनसे शेष अन्य लोग अनुप्रमणित होते हैं। लोगों को जो चीज आपस में एक सूत्र में बांधती है और उन्हें एक समाज में पूरी तरह शामिल करती है, वह यह हैं कि हरेक व्यक्ति को सामाजिक गतिविधियों में इस तरह हिस्सेदार या भागीदार बनाया जाए, ताकि उसकी सफलता में उसे स्वयं अपनी सफलता और उसकी विफलता में अपनी विफलता दिखाई दे। जातिप्रथा इस प्रकार की सामूहिक गतिविधियों का आयोजन नहीं होने देती और सामूहिक गतिविधियों को इस प्रकार वर्जित करके ही उसने हिन्दुओं को एक ऐसे समाज के रूप में उभरने से रोका है, जिसमें सभी समुदाय एक होकर जिएं और उनमें एक ही चेतना व्याप्त हो जाए।
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हिन्दू लोग प्रायः यह शिकायत करते हैं समाज में अलग से असामाजिक तत्त्वों का कोई दल है जो असामाजिक बुराईयों या भावना का कारण है, लेकिन वे अपनी सुविधा के लिए यह भूल जाते हैं कि यह असामाजिक भावना उनकी अपनी जातिप्रथा का ही एक सबसे घृणित पक्ष है। एक जाति के लोग आनंद लेकर ऐसे गीत गाते हैं, जिनमें दूसरी जाति के प्रति नफरत छिपी रहती है। पिछले विश्व युद्ध में जर्मन लोगों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध ऐसे ही अपमान भरे गीत गाए थे। हिन्दुओं के साहित्य में जाति विशेषों के उद्गम के संबंध में ऐसे अनेक गीत आदि हैं, जिनमें एक जाति को सर्वोच्च और दूसरी को निंदा का पात्र बनाने का प्रयास किया गया है। ऐसे साहित्य का एक घृणित नमूना ‘सह्याद्रिखंड’ है। यह असामाजिक भावना जाति तक ही सीमित नहीं है। इसकी जड़ें और भी गहरी हैं और इसने उप - जातियों के आपसी संबंधों को भी विकृत कर दिया है। मेरे अपने प्रांत में स्वयं ब्राह्मणों की ही अनेक उप - शाखाएं हैं, जैसे गोलक ब्राह्मण, देवरुख ब्राह्मण, कराड ब्राह्मण, पाल्श ब्राह्मण और चितपावन ब्राह्मण। लेकिन इनमें परस्पर जो असामाजिकता की भावना है, वह उतनी ही अधिक एवं उतनी ही उग्र है, जैसे कि ब्राह्मणों और अन्य गैर - ब्राह्मण जातियों के बीच में है। लेकिन इसमें कोई विचित्रता नहीं है। जब भी कोई समुदाय अपने स्वार्थ से प्रेरित हो जाता है तो उसमें असामाजिकता की भावना उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण वह समुदाय अन्य समुदायों से पूरा संवाद और संपर्क करना बंद कर देता है, क्योंकि वह अपने स्वार्थ की सुरक्षा करना ही अपना उद्देश्य मान बैठता है। यह असामाजिक भावना, अर्थात् अपने स्वार्थ की रक्षा की भावना ही विभिन्न जातियों के एक - दूसरे से अलग होने