2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 77

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

का एक वैसा ही विशिष्ट लक्षण है, जैसा कि अलग - अलग राष्ट्रों का। ब्राह्मणों का मुख्य उद्देश्य यह है कि गैर - ब्राह्मणों के विरुद्ध अपने स्वार्थ की रक्षा करें और गैर - ब्राह्मणों का मुख्य उद्देश्य यह है कि ब्राह्मणों के विरुद्ध अपने स्वार्थ की रक्षा करें। इसलिए हिन्दू समुदाय विभिन्न जातियों का एक संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि वह शत्रुओं का समुदाय है। उसका हर विरोधी वर्ग स्वयं अपने लिए और अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही जीवित रहना चाहता है। इस जातिप्रथा का एक और निंदनीय पक्ष भी है। अंग्रेजों के पूर्वजों ने ‘वार ऑफ द रोजेज‘ और ‘क्रॉमवेलियन वार‘ से एक पक्ष की ओर से या दूसरे पक्ष की ओर से (युद्ध में) भाग लिया था। लेकिन जिन लोगों ने इनमें से किसी एक के पक्ष में युद्ध में भाग लिया, उनके आज के वंशज दूसरे पक्ष की आरे से भाग लेने वालों के वंशजों के विरुद्ध किसी प्रकार की बदले की भावना नहीं रखते। वे इस आपसी लड़ाई को भूल चुके हैं। लेकिन आजकल के गैर - ब्राह्मण आजकल के ब्राह्मणों को इसलिए क्षमा नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उनके पूर्वजों ने शिवाजी का अपमान किया था। इसी तरह आजकल के कायस्थ भी आजकल के ब्राह्मणों को इसीलिए माफ नहीं कर रहे हैं, क्योंकि ब्राह्मणों के पूर्वजों के पूर्वजों ने उनके पूर्वजों के पूर्वजों का अपमान किया था। अंग्रेजों और भारतीयों में ऐसा अंतर क्यों? स्पष्ट है कि यह जातिप्रथा के कारण ही है। विभिन्न जातियों के होने के कारण और जातिगत चेतना के कारण ही विभिन्न जातियों के आपस के अतीत के विरोध भुलाए नहीं जा सके हैं। और इसी कारण जातियों में एकात्मता नहीं आ पाई है।

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देश के विभिन्न असम्मिलित क्षेत्रों और अंशतः सम्मिलित क्षेत्रों के बारे में आजकल जो चर्चा चल रही है, उससे भारत में मूल जन - जातियों की स्थिति पर लोगों का ध्यान गया है। इन जातियों के लोगों की संख्या कम से कम लगभग एक करोड़ तीस लाख होगी। यदि हम इस प्रश्न को छोड़ दें कि नए संविधान में उन्हें सम्मिलित न करना सही है या गलत, सच यह है कि हालांकि हमारा देश इस बात पर गर्व करता है कि हमारी सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है, ये मूल आदिम जातियां इसी पुरानी असभ्य स्थिति में रह रही है। न केवल वे असभ्य स्थिति में हैं, बल्कि कुछ जातियों के काम - धंधे भी इसी प्रकार के हैं कि उन सबको आपराधिक जातियों में वर्गीकृत कर दिया गया है। इसी तरह हमारी आज की भरी - पूरी सभ्यता की अवस्था में भी एक करोड़ तीस लाख आदमी अभी भी जंगलियों की तरह रह रहे हैं और वंश - परंपरागत अपराधियों का जीवन बिता रहे हैं। लेकिन हिन्दुओं को इसमें कभी कोई शर्म महसूस नहीं हुई। मैं समझता हूं कि यह एक ऐसी घटना है, जो अन्यत्र कहीं नहीं है। इस शर्मनाक स्थिति का क्या कारण है? इन आदिम जातियों को सभ्य बनाने का और उन्हें सम्मानजक ढंग से जीविका दिलाने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? हिन्दू लोग उनकी इस बर्बर अवस्था का यह कारण बताएंगे कि वे जन्म से ही जंगली हैं। वे यह कभी नहीं मानेंगे कि ये आदिम जातियां इस कारण जंगली की जंगली रह गई है, क्योंकि हिन्दू लोगों ने उन्हें सभ्य बनाने, उन्हें चिकित्सीय सहायता देने, उन्हें सुधारने और