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जातिप्रथा - उन्मूलन

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और सुधार की आशा भी समाप्त हो जाएगी। आजकल किसी भी जाति के पास किसी भी ऐसे व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत करने का पूरा अधिकार रहता है, जिसने उस जाति के नियम को तोड़ने का अपराध किया हो। अगर इस बात को समझ लिया जाए कि जाति से बहिष्कृत होने का अर्थ है, उसे समाज के किसी भी कार्य में भाग न लेने देना, तो वस्तुतः यह कहना कठिन है कि जाति - बहिष्कार अधिक कठोर दंड है या मृत्यु। इसलिए आश्चर्य नहीं कि किसी हिन्दू में यह साहस नहीं है कि वह जाति की सीमा को तोड़कर अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति कर सके। यह सही है कि आदमी अपने सहयोगियों से पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता, लेकिन यह भी सही है कि वह उनके बिना रह भी नहीं सकता। वह चाहता यह है कि उसके सभी साथी उसकी अपनी शर्तों पर उसके साथ रहें। लेकिन अगर वे लोग उसकी शर्तें नहीं मानते तो वह किसी भी शर्त पर उनका साथ लेने के लिए तैयार हो जाएगा - भले ही उसे इसके लिए पूर्णतः आत्म - समर्पण करना पड़े। कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति समाज के बिना नहीं रह सकता। मनुष्य की असहायता का लाभ उसकी जाति हर समय उठाने के लिए तैयार रहती है और वह इस पर भी बल देती है कि सभी व्यक्ति उस जाति की संहिता का अक्षरशः और तत्वतः पूरा पालन करें। कोई भी जाति किसी भी सुधारवादी व्यक्ति के जीवन को नरकतुल्य बना देने के लिए षड्यंत्र करके बड़ी आसानी से अपने को संगठित कर सकती है। अगर षड्यंत्र अपराध है तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि अगर कोई आदमी अपनी जाति के नियमों के विरुद्ध कुछ करने का साहस करता है, तो उसे जाति - बहिष्कृत करने के जघन्य अपराध को कानून में दंडनीय अपराध क्यों नहीं बनाया जाता। लेकिन आजकल जो स्थिति है, उसके अनुसार कानून ने भी हर जाति को इस बात का पूरा अधिकार दे रखा है कि वह अपने सदस्यों के लिए नियम बनाए, उन्हें उनके अनुसार चलाए और विरोधियों को जाति - बहिष्कृत करके दंडित करे। इस प्रकार रूढि़वादियों ने सुधारकों को उत्पीडि़त करने और सुधारों को समाप्त करने के लिए जाति को सशक्त माध्यम के रूप में अपनाया है।

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हिन्दुओं की नीति और आचार पर जातिप्रथा का प्रभाव अत्यधिक शोचनीय है। जातिप्रथा ने जन - चेतना को नष्ट कर दिया है। उसने सार्वजनिक धर्मार्थ की भावना को भी नष्ट कर दिया है। जातिप्रथा के कारण किसी भी विषय पर सार्वजनिक सहमति का होना असंभव हो गया है। हिन्दुओं के लिए उनकी जाति ही जनता है। उनका उत्तरदायित्व अपनी जाति तक सीमित है। उनकी निष्ठा अपनी जाति तक ही सीमित है। गुणों का आधार भी जाति ही है और नैतिकता का आधार भी जाति ही है। सही व्यक्ति के प्रति (अगर वह उनकी अपनी जाति का नहीं है) उनकी सहानुभूति नहीं होती। गुणों की कोई सराहना नहीं है, जरूरतमंद के लिए सहायता नहीं है। दुखियों की पुकार का कोई जवाब नहीं है। अगर सहायता दें तो वह केवल जाति मात्र तक सीमित है। सहानुभूति है, लेकिन अन्य