64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ज्ञात होगा कि इसका कारण उनके अपने रहन - सहन के तौर - तरीकों में अंतर है। एक ओर सिखों और मुसलमानों के आपसी रहन - सहन का तरीका, उनमें भाईचारे की भावना पैदा करता है। दूसरी ओर हिन्दुओं के आपसी रहन - सहन के तौर - तरीके इस भावना को पैदा नहीं होने देते। सिखों और मुसलमानों में एकता का वह सामाजिक तत्व है, जो उन्हें भाई - भाई बनता है। हिन्दुओं में एकता का ऐसा कोई तत्व नहीं है और कोई भी हिन्दू दूसरे हिन्दू को अपना भाई नहीं मानता। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सिख लोग ऐसा क्यों कहते और सोचते हैं कि एक सिख या एक खालसा सवा लाख आदमियों के बराबर होता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि एक मुसलमान हिन्दुओं की भीड़ के बराबर क्यों है। निःसंदेह यह अंतर हिन्दुओं की जातिप्रथा के कारण है। जब तक जातिप्रथा रहेगी, हिन्दुओं में संगठन नाम की कोई बात नहीं रहेगी और जब तक उनमें संगठन नहीं होगा हिन्दू कमजोर और डरपोक रहेंगे। हिन्दू कहते हैं कि उनकी कौम बड़ी सहनशील है। मेरे मत से यह बात सही नहीं है। अनेक अवसरों पर यदि उनका असहनीय रूप देखा जा सकता है और कुछ अवसरों पर उनमें सहनशीलता देखी जाती है, तो उसका कारण यह है कि या तो वे विरोध करने में अत्यधिक शक्त हैं, या पूरी तरह उदासीन हैं। हिन्दुओं की यह उदासीनता इस कदर उनकी आदत का हिस्सा बन चुकी है कि हिन्दू किसी अपमान या अन्याय को बुजदिल बनकर सहता रहेगा। मौरिस के शब्दों में उनमें यह दिखाई देता है कि ‘‘बड़े लोग छोटे लोगों को कुचल रहे हैं, ताकतवर लोग कमजोरों को मार रहे हैं, क्रूर लोग निडर होकर विचरण कर रहे हैं, दयालु लोग साहस न होने के कारण चुप हैं और श्रीमान लोग लापरवाह हैं।‘‘ हिन्दू देवता भी धैर्यवान और सहिष्णु हैं इसलिए अन्याय और उत्पीड़न के शिकार हुए हिन्दुओं की दयनीय स्थिति की कल्पना करना असंभव नहीं है। उदासीनता किसी समुदाय को लगने वाली सबसे घातक बीमारी है। हिन्दू परस्पर इतने उदासीन क्यों हैं? मेरे विचार से यह उदासीनता जातिप्रथा के कारण है और इसके कारण किसी अच्छे काम के लिए भी उनमें संगठन और सहयोग होना असंभव हो गया है।
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कोई भी सुधार तब शुरू होता है, जब कोई व्यक्ति अपने समुदाय के मानकों, समुदाय की सत्ता और समुदाय के हित से ऊपर और उससे अलग अपने विचारों, अपनी धारणाओं और स्वयं की स्वतंत्रता और हित पर अधिक बल देता है। लेकिन यह सुधार आगे लगातार संपन्न होगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति का समुदाय उसके दृढ़ विचारों को किस सीमा तक समर्थन देता है। अगर समुदाय में सहनशीलता की भावना है और वह अपने लोगों से न्यायोचित व्यवहार करता है, तो ऐसे व्यक्ति अपने विचारों पर दृढ़ रहेंगे और अंततः अन्य लोगों को भी नए विचारों से सहमत कराने में सफल हो जाएंगे। किन्तु दूसरी ओर, अगर समुदाय सहनशील नहीं है और वह सही या गलत, किसी भी उपाय से ऐसे व्यक्तियों की आवाज को दबा देता है, तो ऐसे व्यक्ति समाप्त हो जाएंगे