2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 87

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

रखा। अन्य लोगों को उसने भूख शांत करने में लगे रहने के साथ - साथ बहादुर प्रवृत्ति का भी पाया। इन्हें उसने युद्ध के समय रक्षक वर्ग में और आंतरिक शांति बनाए रखने वालों के वर्ग में रखा। अन्य लोगों में उसने यह देखा कि उनके पास वस्तुओं और तथ्यों के आधारभूत सार्वभौम कारण को समझने की क्षमता थी। ऐसे लोगों को उसने शेष लोगों के लिए कानून बनाने वालों के वर्ग में रखा। लेकिन प्लेटों के उक्त गणराज्य (रिपब्लिक) की जिस बात के लिए आलोचना की जाती है, वहीं आलोचना चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था के संबंध में भी की जा सकती है, क्योंकि इसका आधार यह संभावना है कि सभी लोगों को बिल्कुल सही ढंग से चार अलग - अलग वर्ग में रखा जा सकता है। प्लेटो के विरुद्ध सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि उसका सभी लोगों को तीन बिल्कुल अलग - अलग विशिष्ट वर्गों में निर्जीव व्यक्तियों की तरह डाल देना, मनुष्य और उसकी शक्तियों के प्रति बहुत ही सतही दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है। प्लेटों को इस बात का सम्यक् ज्ञान नहीं था कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशिष्टता होती है, वह शत - प्रतिशत औरों की तरह नहीं होता, और प्रत्येक व्यक्ति का अपना वर्ग अलग ही होता है। वह इस तथ्य को पहचान नहीं पाया कि एक ही व्यक्ति की सक्रिय प्रवृत्तियों में अनंत विविधता हो सकती है, या उसमें प्रवृत्तियों के असंख्य योग हो सकते हैं। उसके विचार से व्यक्ति के गठन में कई प्रकार की क्षमताएं या शक्तियां होती हैं। उसके कथन की असत्यता स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है। आधुनिक विज्ञान से यह सिद्ध हो गया है कि व्यक्तियों को कुछेक विशिष्ट वर्गों में निर्जीवों की तरह विभाजित कर देना, उनके प्रति बहुत ही सतही दृष्टिकोण को प्रदर्शित करना है - वस्तुतः यह विचार इस योग्य ही नहीं है कि इस पर विशेष ध्यान दिया जाए। इस कारण अगर हमें व्यक्तियों के गुणों का उपयोग करना है, तो उनका वर्गों में विभाजन पूर्णतः असंगत होगा, क्योंकि व्यक्तियों के गुण या विशेषताएं अति विविध प्रकार की होती हैं। इसलिए जिस कारण से प्लेटो के गणराज्य की कल्पना असफल सिद्ध हुई, उसी कारण चातुर्वर्ण्य भी असफल होगा, अर्थात व्यक्तियों को एक वर्ग या दूसरे वर्ग का मानकर उन्हें अलग - अलग खानों में बांटना संभव नहीं है। लोगों को बिल्कुल सही तौर पर चार निश्चित वर्गों में बांटना इसलिए भी असंभव है कि यह सिद्ध है कि पहले जो चार वर्ग थे, वे अब स्वयं चार हजार जातियों में बंट गए हैं।

चातुर्वर्ण्य की स्थापना के मार्ग में एक तीसरी कठिनाई भी है। अगर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था स्थापित हो भी जाए तो उसे किस तरह बनाए रखा जाएगा? चातुर्वर्ण्य की सफलता की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता यह है कि एक दंड पद्धति भी रहे, जो दंड - विधान के जरिए इस व्यवस्था को जारी रखे। चातुर्वर्ण्य को तोड़ने वालों से निपटने की समस्या इसमें लगातार आती रहेगी। अगर इस व्यवस्था को तोड़ने पर दंड का विधान न हो तो लोगों को उनके अपने - अपने वर्ग में बांधे रखना संभव नहीं होगा। पूरी पद्धति छिन्न - भिन्न हो जाएगी, क्योंकि यह वर्गीकरण मानव प्रकृति के अनुकूल नहीं है। चातुर्वर्ण्य अपनी अंतर्निहित अच्छाई के आधार पर ही बना नहीं रह सकता। इसे कानून द्वारा ही लागू कराना होगा। दांडिक