जातिप्रथा - उन्मूलन
71
अनुशास्ति के बिना चातुर्वर्ण्य के विचार को चरितार्थ नहीं किया जा सकता। इसका प्रमाण ‘रामायण‘ की कथा में मिलता है, जिसमें राम ने शम्बूक का वध किया था। कुछ लोग राम को दोषी मानते हैं कि उन्होंने खिलवाड़स्वरूप या किसी कारण के बिना शम्बूक का वध किया था। परंतु यदि राम पर शम्बूक की हत्या करने का दोष लगाया जाता है, तो संपूर्ण स्थिति को गलत समझना होगा। रामराज चातुर्वर्ण्य पर आधारित राज था। राजा के रूप में राम चातुर्वर्ण्य को अक्षुण्ण रखने के लिए बाध्य थे, अतः शम्बूक की हत्या करना उनका कर्तव्य था, क्योंकि शम्बूक शुद्र था और उसने अपने वर्ग का अतिक्रमण किया था तथा वह ब्राह्मण बनना चाहता था। यही कारण है कि राम ने शम्बूक को मार डाला। लेकिन इससे यह प्रकट होता है कि चातुर्वण्य को बनाए रखने के लिए दांडिक अनुशास्ति आवश्यक है। इसके लिए न केवल दांडिक अनुशास्ति, बल्कि मृत्यु - दंड भी आवश्यक है। यही कारण है, राम ने शम्बूक को मृत्यु - दंड से कम दंड नहीं दिया। यही कारण है कि ‘मनुस्मृति‘ में इतना भारी दंडादेश विहित किया गया है कि यदि कोई शूद्र वेद पाठ करता है या वेद पाठ सुन लेता है तो उसकी जिहवा काट ली जाए या उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। चातुर्वण्य के समर्थकों को यह आश्वासन देना होगा कि वे मनुष्यों का वास्तविक वर्गीकरण करेंगे और बीसवीं शताब्दी के आधुनिक समाज को इस बात के लिए प्रेरित करेंगे कि वह ‘मनुस्मृति‘ की दांडिक अनुशास्तियों में संशोधन करे।
ऐसा प्रतीत होता है कि चातुर्वर्ण्य के समर्थकों ने यह नहीं सोचा है कि उनकी इस वर्ग - व्यवस्था में स्त्रियों का क्या होगा? क्या उन्हें भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - चार वर्गों में विभाजित किया जाएगा, या उन्हें अपने पतियों का दर्जा प्राप्त कर लेने दिया जाएगा? यदि स्त्री का दर्जा शादी के बाद बदल जाएगा तो चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत का क्या होगा, अर्थात् क्या किसी व्यक्ति का दर्जा उसके गुण पर आधारित होना चाहिए? यदि उनका वर्गीकरण उनके गुण के आधार पर किया जाता है, तो क्या उनका ऐसा वर्गीकरण नाममात्र का होगा या वास्तविक। यदि वह नाममात्र का है, तो बेकार है। इस स्थिति में तो चातुर्वर्ण्य के समर्थकों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी वर्ण - व्यवस्था स्त्रियों पर लागू नहीं होती। यदि यह वास्तविक है, तो क्या चातुर्वर्ण्य के समर्थक स्त्रियों पर इस व्यवस्था में लागू करने के तर्कसंगत परिणामों का अनुसरण करने के लिए तैयार हैं? उन्हें महिला पुरोहित तथा महिला सैनिक रखने के लिए तैयार रहना होगा। हिन्दू समाज महिला शिक्षकों तथा महिला बैरिस्टरों का अभ्यस्त हो गया है। वह महिला किण्वकों और महिला कसाइयों के लिए भी अभ्यस्त हो सकता है। लेकिन वह एक बहादुर आदमी होगा, जो यह कहेगा कि हिन्दू समाज महिला पुरोहितों और महिला सैनिकों के लिए अनुमति देगा। लेकिन यह स्त्रियों पर चातुर्वर्ण्य लागू करने का तर्कसंगत परिणाम होगा। इन कठिनाइयों के बावजूद मेरा विचार है कि एक जन्मजात मूर्ख को छोड़कर कोई भी व्यक्ति यह आशा और विश्वास नहीं कर सकता कि चातुर्वर्ण्य का फिर से सफल उद्भव होगा।