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जातिप्रथा - उन्मूलन

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सभ्यता बन गई है जिसकी अविछिन्न धारा आज तक प्रवाहित है, यद्यपि कभी - कभी इसकी गति मंद और स्थिर भी रही है। इसने चार या पांच सहस्त्राब्दियों से भी अधिक समय से आध्यात्मिक विचारधारा एवं अनुभवों से प्रभावित होकर भी इसका मूलतत्व अक्षुण्ण रहा है। यद्यपि इतिहास के आदिकाल से भिन्न - भिन्न जातियों एवं संस्कृति के लोग भारत में आते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म ने अपनी सर्वेच्चता अक्षुण्ण रखी है, यहां तक कि राजनीतिक शक्ति द्वारा पोषित धर्म - परिवर्तनकारी जातियां भी अधिसंख्य हिन्दुओं को अपने विचार मनवा लेने के लिए बाध्य नहीं कर पाई हैं। हिन्दू संस्कृति में कुछ ऐसी जीवन शक्ति है जो अन्य शक्तिशाली धाराओं में नहीं मिल सकती। यह देखने के लिए हिन्दू धर्म के वृक्ष को काटना आवश्यक नहीं है कि क्या उसमें आज भी रस निकल रहा है।’’ इस विषय में तो राधाकृष्णन का नाम ही काफी है कि वे जो कुछ कहते हैं उसमें गंभीरता होती है, और पाठकों को प्रभावित करते हैं। पर मुझे अपना विचार प्रकट करने में संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुझे इस बात की आशंका है कि कहीं उनका कथन इस गलत तर्क का आधार न बन जाए कि अस्तित्व जीवित रहने की उपयुक्तता का प्रमाण है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सवाल यह नहीं है कि कोई समुदाय जीवित रहता है या समाप्त हो जाता है, बल्कि यह है कि वह कैसे सम्मान के साथ जीवित रहता है। जीवित रहने के विभिन्न प्रकार हैं। लेकिन वे सबके सब सम्मानजनक नहीं हैं। किसी व्यक्ति और समाज के लिए मात्र जीवनयापन करने और सम्मानपूर्वक जीवनयापन करने में पर्याप्त अंतर है। युद्ध में लड़ना और गौरवपूर्ण जीवन व्यतीत करना, जीवित रहने का एक प्रकार है। पराजित होना, आत्म - समर्पण करना और एक बंदी के रूप में जीवन व्यतीत करना भी अस्तित्व का एक प्रकार है। किसी हिन्दू के लिए इस बात से संतुष्ट होना व्यर्थ है कि वह और अन्य जीवित रहे हैं। मुझे यह सोचना होगा कि उसके जीवन की गुणवत्ता क्या है। यदि वह ऐसा सोचेगा तो मुझे विश्वास है, वह मात्र अस्तित्व का दंभ छोड़ देगा। हिन्दु के जीवन में तो सतत पराजय ही रही है। उसे जो यह प्रतीत होता है कि उसका जीवन ते सतत प्रवाहमान रहा है, वह सतत प्रवाहमान नहीं रहा है, बल्कि वस्तुतः वह ऐसा जीवन रहा है, जिसका सतत ह्रास होता रहा है।

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मेरी राय में इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब तक आप अपनी सामाजिक व्यवस्था नहीं बदलेंगे, तब तक कोई प्रगति नहीं होगी। आप समाज को रक्षा या अपराध के लिए प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन जाति - व्यवस्था की नींव पर आप कोई निर्माण नहीं कर सकते : आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते, आप नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकते। जाति - व्यवस्था की नींव पर आप कोई भी निर्माण करेंगे, वह चटक जाएगा और कभी भी पूरा नहीं होगा।

अब केवल एक प्रश्न रहता है, जिस पर विचार करना है। वह एक है कि ‘हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में सुधार कैसे किया जाए?‘ जातिप्रथा को कैसे समाप्त किया जाए? यह