78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा विचार व्यक्त किया गया है कि जाति - व्यवस्था में सुधार करने के लिए पहला कदम यह होना चाहिए कि उप - जातियों को समाप्त किया जाए। यह विचार इस उप - धारणा पर आधारित है कि जातियों के बीच तौर - तरीकों और स्तर के अपेक्षाकृत उप - जातियों के तौर - तरीकों तथा स्तर में अधिक समानता है। मेरे विचार से यह एक गलत धारणा है। डकन तथा दक्षिण भारत के ब्राह्मणों की तुलना में उत्तर तथा मध्य भारत के ब्राह्मण सामाजिक रूप से निम्न श्रेणी के हैं। उत्तर तथा मध्य प्रांत के ब्राह्मण केवल रसोइया और पानी पिलाने वाले हैं, जब कि डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का सामाजिक स्तर बहुत ऊंचा है। दूसरी ओर, उत्तरी भारत के वैश्य और कायस्थ बौद्धिक एवं सामाजिक रूप से डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों के समकक्ष होते हैं। इसके अतिरिक्त, आहार के मामले में भी डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों और कश्मीरी और बंगाल के ब्राह्मण में कोई समानता नहीं है। दक्षिण के ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं, जब कि कश्मीर और बंगाल के ब्राह्मण मांसाहारी। जहां तक आहार का संबंध है, डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों और ब्राह्मणेतर गुजराती, मारवाड़ी, बनियों और जैन जैसी जातियों में काफी समानता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक से दूसरी जाति में संक्रमण को आसान बनाने के लिए उत्तरी भारत के कायस्थों और दक्षिण भारत की अन्य ब्राह्मणेतर जातियों को डकन तथा द्रविड़ प्रदेश की ब्राह्मणेर जातियों में मिला देना दक्षिण भारत के ब्राह्मणों को उत्तर भारत के ब्राह्मणों में मिला देने के अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक होगा। लेकिन यदि यह मान लिया जाए कि उप - जातियों का विलय संभव है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि उप - जातियों के समाप्त होने के परिणामस्वरूप जातियां निश्चित रूप से समाप्त हो जाएंगी। इस स्थिति में उप - जातियों के समाप्त होने से जातियों की जड़ें और मजबूत हो जाएंगी और वे शक्तिशाली बन जाएंगी। परिण् ामस्वरूप वे अधिक हानिकर सिद्ध होंगी। अतः यह उपाय न तो व्यवहार्य है और न ही कारगर। यह उपाय निश्चित रूप से गलत सिद्ध होगा। जाति - व्यवस्था समाप्त करने की एक और कार्य - योजना है कि अंतर्जातीय खान - पान का आयोजन किया जाए। मेरी राय में यह उपाय भी पर्याप्त नहीं है। ऐसी अनेक जातियां हैं, जो अंतर्जातीय खान - पान की अनुमति देती हैं। इस विषय में सामान्य अनुभव यह रहा है कि अंतर्जातीय खान - पान की व्यवस्था जाति - भावना या जाति - बोध को समाप्त करने में सफल नहीं हो पाई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इसका वास्तवकि उपचार अंतर्जातीय विवाह ही है। केवल खून के मिलते ही रिश्ते की भावना पैदा होगी और जब तक सजातीयता की भावना को सर्वोच्च स्थान नहीं दिया जाता, जब तक जाति - व्यवस्था द्वारा उत्पन्न की गई पृथकता की भावना, अर्थात् पराएपन की भावना समाप्त नहीं होगी। हिन्दुओं में अंतर्जातीय विवाह सामाजिक जीवन में निश्चित रूप से महान शक्ति का एक कारक सिद्ध होगा। गैर - हिन्दुओं में इसकी इतनी आवश्यकता नहीं है। जहां समाज संबधों के ताने - बाने से सुगठित होगा, वहां विवाह जीवन की एक साधारण घटना होगी। लेकिन जहां समाज छिन्न - भिन्न है, वहां बाध्यकारी