2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 99

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

होगा कि वे पुरोहित ब्राह्मणों के विरुद्ध किए गए आंदोलन में भाग लेंगे? मेरे निर्णय के अनुसार धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मणों और पुरोहित ब्राह्मणों में भेद करना व्यर्थ है। वे दोनों आपस में रिश्तेदार हैं। वे एक शरीर की दो भुजाएं हैं। एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण का अस्तित्व बनाए रखने हेतु लड़ने के लिए बाध्य है। इस संबंध में मुझे प्रो. डाइसी की सारगर्भित टिप्पणियां याद आती हैं, जो उन्होंने अपने ‘इंगलिश कांस्टिट्यूशन‘ में दी हैं। संसद की विधायी सर्वोच्चता की वास्तविकता परिसीमा के संबंध में डाइसी ने कहा है - ‘किसी भी प्रभुतासंपन्न, विशेषतः संसद द्वारा सत्ता का वास्तविक प्रयोग दो परिसीमाओं से परिबद्ध या नियंत्रित है। इनमें एक बाह्य और दूसरी आंतरिक परिसीमा है। किसी प्रभुतासम्पन्न की वास्तविक शक्ति की बाह्य सीमा ऐसी संभावना या निश्चितता को कहा जाता है कि उसकी प्रजा या अधिकांश प्रजा उसके कानूनों की अवज्ञा या विरोध करेगी। प्रभुसत्ता के प्रयोग की आंतरिक सीमा स्वयं प्रभुसत्ता के स्वरूप से उत्पन्न होती है। निरकुंश शासक भी अपने चरित्र के अनुसार अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है, जिसका निर्माण उसकी परिस्थिति, तत्समय प्रवृत्त नैतिक भावनाओं और उस समाज के आधार पर होता है, जिससे वह संबंधित है। सुल्तान अगर चाहता भी तो मुस्लिम विश्व के धर्म को परिवर्तित नहीं कर सका। लेकिन यदि वह ऐसा कर भी सकता था तो यह बिल्कुल असंभव था कि मुस्लिम धर्म का अध्यक्ष मुस्लिम धर्म को समाप्त करना चाहेगा। सुल्तान की शक्ति का प्रयोग करने से संबद्ध आंतरिक व्यवस्था भी इतनी ही मजबूत थी, जितनी कि बाह्य परिसीमा। लोग कभी - कभी व्यर्थ का प्रश्न पूछते हैं कि पोप ने अमुक सुधार लागू क्यों नहीं किया? इसका सही उत्तर यह है कि एक क्रांतिकारी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो पोप बन जाए और जब कोई आदमी पोप बन जाएगा, तब वह एक क्रांतिकारी बनना नहीं चाहेगा।‘‘ मेरे विचार से ये अभ्युतियां भारत के ब्राह्मणों पर भी समान रूप से लागू होती हैं और कोई भी व्यक्ति यह कह सकता है कि यदि कोई व्यक्ति पोप बन जाता है तो एक क्रांतिकारी बनने की उसकी इच्छा नहीं होती। जो व्यक्ति ब्राह्मण पैदा हुआ है, वह एक क्रांतिकारी बनने की इच्छा बहुत कम करता है। वास्तव में, सामाजिक सुधार के मामले में किसी ब्राह्मण से एक क्रांतिकारी बनने की आशा करना उतना ही बेकार है जितना कि ब्रिटिश संसद से यह आशा करना, जैसा कि लेस्ली स्टीफन ने कहा था कि वह ऐसा अधिनियम पारित करेंगे, जिसके अनुसार सभी नीली आंखों वाले बच्चों की हत्या कर दी जाएगी।

आपमें से कुछ यह कहेंगे कि यह एक मामूली बात है कि जातिप्रथा समाप्त करने के आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए ब्राह्मण आगे आएं अथवा नहीं। मेरे विचार से इस दृष्टिकोण का अपनाया जाना समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा अदा की गई भूमिका की उपेक्षा करना होगा। चाहे आप इस सिद्धांत को मानें या न मानें कि एक महान पुरुष इतिहास का निर्माता होता है, लेकिन आपको इतना अवश्य स्वीकार करना होगा कि प्रत्येक देश में बुद्धिजीवी वर्ग सर्वाधिक प्रभावशाली वर्ग रहा है, वह भले ही शासक वर्ग न रहा हो। बुद्धिशाली वर्ग वह है, जो दूरदर्शी होता है, सलाह दे सकता है और नेतृत्व प्रदान कर