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जातिप्रथा - उन्मूलन

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जाएगा तो पाप लगेगा। सुधार का एक और प्रकार है - वह है, ‘जाति - व्यवस्था को नष्ट करना‘। यह सुधार तीसरे वर्ग के अंतर्गत आता है। लोगों से जातपांत त्यागने के लिए कहने का अर्थ, उनको मूल धार्मिक धारणाओं के विपरीत चलने के लिए कहना है। यह स्पष्ट है कि सुधार का पहला और दूसरा मार्ग सरल है। लेकिन तीसरे मार्ग के सुधार में अत्यधिक कार्य करना होगा, जो प्रायः असंभव सा है। हिन्दू सामाजिक - व्यवस्था को पवित्र मानते हैं। जाति - व्यवस्था का आधार ईश्वरीय है। अतः आपको इस पवित्रता और देवत्व को नष्ट करना होगा, जो जाति व्यवस्था में समाया हुआ है। अंतिम विश्लेषण के रूप में, इसका अर्थ यह है कि आपको शास्त्रों और वेदों की सत्ता समाप्त करनी होगी।

मैंने जाति - व्यवस्था समाप्त करने के उपाय और साधनों से संबंधित प्रश्न पर जोर इसलिए दिया है, क्योंकि मेरे लिए आदर्श से अवगत होने के अपेक्षाकृत उचित उपायों और साधनों की जानकारी प्राप्त कर लेना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आपको वास्तविक उपाय और साधनों की जानकारी नहीं है तो आपके सभी प्रयास निष्फल रहेंगे। यदि मेरा विश्लेषण सही है तो आपका कार्य भी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं होगा। केवल आप ही यह कह सकते हैं कि क्या आप इस कार्य को सम्पन्न कर सकेंगे।

मेरे विचार से यह कार्य प्रायः असंभव है। शायद आप यह जानना चाहेंगे कि मैं ऐसा क्यों सोचता हूं। जिन कारणों से मैंने यह दृष्टिकोण अपनाया है, उनमें से ऐसे कुछ कारणों का उल्लेख करूंगा। जिन्हें मैं अत्यंत महत्वपूर्ण समझता हूं। उन कारणों में से एक है विद्वेष भाव, जो ब्राह्मणों ने इस समस्या के प्रति प्रदर्शित किया है। ब्राह्मण राजनीतिक तथा आर्थिक सुधार के मामलों के आंदोलन में सदैव अग्रसर रहते हैं। लेकिन जात पांत के बंधन तोड़ने के लिए बनाई गई सेना में वे शिविर - अनुयायी (कैम्प फोलोअर्स) के रूप में भी नहीं पाए जाते। क्या ऐसी आशा की जा सकती है कि भविष्य में इस मामले में ब्राह्मण लोग नेतृत्व करेंगे? मैं कहता हूं, नहीं। आप पूछ सकते हैं, क्यों? आप दलील दे सकते हैं कि इसका कोई कारण नहीं है कि ब्राह्मणों को सामाजिक सुधार से क्यों दूर रहना चाहिए। आप तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि ब्राह्मण यह जानते हैं कि हिन्दू समाज का अभिशाप जाति व्यवस्था है ओर एक प्रबुद्ध वर्ग के रूप में उनसे यह आशा नहीं की जा सकती कि वे इसके परिणामों के प्रति उदासीन रहेंगे। आप यह भी तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि ब्राह्मण दो प्रकार के हैं एक तो धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मण और दूसरे पुरोहित ब्राह्मण। यदि पुरोहित ब्राह्मण जातपांत समाप्त करने वाले लोगों की तरफ से हथियार नहीं उठाता है, तो धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मण उठाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये सारी बातें ऊपर से बहुत ही विश्वसनीय लगती हैं। लेकिन इन सब बातों में हम यह भूल गए हैं कि यदि जाति - व्यवस्था समाप्त हो जाती है तो ब्राह्मण जाति पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए क्या यह आशा करना उचित है कि ब्राह्मण लोग ऐसे आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए सहमत होंगे, जिसके परिणामस्वरूप ब्राह्मण जाति की शक्ति और सम्मान नष्ट हो जाएगा? क्या धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मणों से यह आशा करना उचित