94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वशिष्ठ तीनों लोकों का यज्ञ-कर्म करने में समर्थ हैं। हम लोग उनकी अवज्ञा कैसे कर सकते हैं? त्रिशंकु ने तब कहा, ‘चूंकि मेरे गुरु और गुरु के शिष्यों ने मेरी प्रार्थना को अस्वीकृत कर दिया है, अतः मैं कोई दूसरा उपाय सोचूंगा।’ जब राजा ने अपनी हठ नहीं छोड़ी, तब महर्षि के पुत्रों ने उसे चांडाल होने का शाप दे दिया। यह शाप शीघ्र ही प्रभावी हो गया और जब दुखी राजा की आकृति नीच चांडाल की हो गई, तब उसने विश्वामित्र की शरण ली, जो (जैसा कि हम देख चुके हैं कि उन दिनों वह भी दक्षिण में वास कर रहे थे) अपने तपोबल को बढ़ा रहे थे और अपने भाग्य को कोस रहे थे। विश्वामित्र त्रिशंकु की दशा देखकर द्रवित हो गए और उन्होंने उसे यज्ञ कराने का आश्वासन दे दिया तथा कहा, ‘मैं तुम्हें इसी चांडाल के शरीर-सहित स्वर्ग में भेजूंगा, जो तुम्हें अपने गुरु के शाप से प्राप्त हुआ है। चूंकि तुम कुशिक के पुत्र की शरण में आ गए हो, इसलिए तुम यह समझो कि तुम स्वर्ग में हो।’ फिर उन्होंने यज्ञ में आमंत्रित किए जाने और वशिष्ठ के परिवार-सहित सभी ऋषियों को यज्ञ में आमंत्रित किए जाने का आदेश दिया। विश्वामित्र के जो शिष्य उनका संदेश लेकर गए, उन्होंने लौटने पर इस प्रकार सूचना दीः ‘आपका संदेश पाकर केवल महोदय (वशिष्ठों) को छोड़कर प्रायः संपूर्ण देशों में रहने वाले सभी ब्राह्मण आ रहे हें और सभी महर्षि ओ चुके हैं। वशिष्ठ के सौ पुत्रों ने क्रुद्ध हो जो कुछ कहा है, उसे आप सुनिए। वे कहते हैं कि देवता और ट्टषिगण उस व्यक्ति के यज्ञ में हविष्य कैसे स्वीकार कर सकते हैं, जो चांडाल हो और जिसका यज्ञ कराने वाला आचार्य क्षत्रिय हो? चांडाल का अन्न खाकर और विश्वामित्र के निमंत्रण पर तपस्वी ब्राह्मण स्वर्ग कैसे जा सकते हैं?’ महोदय के साथ वशिष्ठ के सभी पुत्रों ने क्रोध से लाल आंखें करके ये उपर्युक्त कठोर वचन कहे। इस संदेश को सुनकर विश्वामित्र अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने वशिष्ठ के सभी सौ पुत्रों को भस्म होने और नीच की जाति (मृतापह) में सात सौ बार पुनः जन्म लेने और महोदय को निषाद हो जाने का शाप दे दिया। विश्वामित्र ने यह जानकर की शाप प्रभावी हो चुका है, त्रिशंकु की प्रशंसा करते हुए एकत्रित ट्टषियों से यज्ञ आरंभ करने के लिए कहा। इस प्रस्ताव से वे इस डर से सहमत हो गए कि कहीं वे भी क्रोधी मुनि के कोप के भाजन न हो जाएं। उस यज्ञ में विश्वामित्र स्वयं याजक तथा अन्य ट्टषि ट्टत्विज हुए और सभी रीतियां संपन्न हुईं। तब विश्वामित्र ने नैवेद्य अर्पित करने के लिए सभी देवताओं का आवाहन किया, परंतु वे नहीं आए। इस पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और यह यज्ञ की स्रुवा उठाकर त्रिशंकु से इस प्रकार बोले, ‘हे राजन् ! अब तुम तपस्या द्वारा अर्जित मेरा बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्ग पहुंचाता हूं। तुम सशरीर स्वर्ग