स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
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है। आज केवल एक ही ब्रह्मदंड के द्वारा मेरे सभी अस्त्र नष्ट हो गए।’ अब अपमानित और पराजित राजा के पास केवल यही विकल्प रह गया कि या तो इस असहाय हीनता को चुपचाप स्वीकार कर लें या फिर ब्राह्मणत्व के पद पर उन्नत होने के लिए प्रयत्न करें। उन्होंने दूसरे विकल्प को अपनाया और कहाः ‘इस पराजय के बारे में मैंने अच्छी तरह विचार किया। अब मैं अपने मन और इंद्रियों को एकाग्र कर महान तप करूंगा, जिससे मुझे ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हो।’ विश्वामित्र अत्यंत दुखी व संतप्त मन से अपने शत्रु के प्रति घृणा का भाव रख और उसे कोसते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण की ओर चले गए और वहां उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करना आरंभ कर दिया। कहा जाता है कि उनके तीन पुत्र हुए µ हविष्यांद, मधुष्यांद तथा द़ृढ़नेत्र। एक हजार वर्ष के बाद ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने घोषणा की कि विश्वामित्र ने राजर्षियों के लोक पर विजय प्राप्त कर ली और इस तपस्या के परिणामस्वरूप वह यह प्रमाणिज करते हैं कि विश्वामित्र ने उस पद को प्राप्त कर लिया है। विश्वामित्र इस प्रस्ताव को सुनकर लज्जित, दुखी और क्रुद्ध हो गए और बोले µ ‘मैंने घोर तप किया था, तो भी देवता और ट्टषि मुझे राजर्षि ही समझते हैं। लगता है कि तप आदि करने से कोई लाभ नहीं होता।’ इस प्रकार निराश होने पर भी उनको एक पद ऊंचा तो मिल गया था, वह पुनः घोर तपस्या में लीन हो गए।
इस अवधि में उनकी तपस्या में निम्न घटनाओं से विघ्न पड़ा। इक्ष्वाकु के ही एक वंशज राजा त्रिशंकु के मन में एक ऐसा यज्ञ करने का विचार आया, जिसके पुण्य के बल से उन्हें सशरीर स्वर्ग की प्राप्ति हो। जब वशिष्ठ को बुलाकर राजा ने उन्हें अपना यह विचार बताया, तब उन्होंने इसे असंभव कहा। इसके बाद त्रिशंकु दक्षिण की ओर चले गए, जहां ट्टषि के सौ पुत्र तप कर रहे थे। उसने उनसे वह प्रस्ताव किया, जिसे उनके पिता ने अस्वीकार कर दिया था। यद्यपि राजा ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक और विनम्र होकर उनसे निवेदन किया था और यह कहा था कि इक्ष्वाकु संकट में अपने कुल-पुरोहितों की शरण में आते हैं और उनके पिता के बाद वे अब उसके संरक्षक हैं, फिर भी उसे उन क्रोधी ट्टषियों की भर्त्सना ही सुनने को मिली। उन्होंने कहा, ‘आशक्यम् मूर्ख, तुम्हारे सत्यनिष्ठ गुरु ने तुम्हें मना कर दिया है। तुमने उनका निरादर कर दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया। समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिए कुल-गुरु ही परमगति हैं। उस सत्यनिष्ठ मुनि की बात को कोई अन्यथा नहीं कर सकता। दिव्य वशिष्ठ ट्टषि ने जब यह घोषित कर दिया है कि यह असंभव है, उसे हम लोग कैसे कर सकते हैं। राजन्, तुम मूर्ख हो तुम अपनी राजधानी को लौट जाओ। मुनि