96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यहां पर एक नई कथा का वर्णन प्रारंभ हो जाता है। वह कथा अयोध्या नरेश अंबरीष की है, जो ‘रामायण’ के अनुसार इक्ष्वाकु के 28वें तथा त्रिशंकु के 22वें वंशज थे। कहा जाता है कि विश्वामित्र इन दोनों राजाओं से समकालीन थे। कथा में कहा गया हैः
जब अंबरीश यज्ञ में लग हुए थे तो इंद्र ने उनके यज्ञ-पशु को चुरा लिया।
पुरोहित ने कहा कि यह अशुभ घटना राजा के कुशासन के कारण हुई है और
अगर यज्ञ-पशु नहीं खोज लिया जाता, तो नर-बलि देनी पड़ेगी। खोजते-खोजते
राजर्षि अंबरीश ब्रह्मर्षि भृगु के वंशज ट्टचीक के पास पहुंचे और उनसे याचना
की कि वह एक लाख गायें लेकर अपने एक पुत्र को बलि के लिए दे दें।
ट्टचीक ने कहा कि वह अपना ज्येष्ठ पुत्र नहीं देंगे, और उनकी पत्नी ने कहा
कि वह अपना कनिष्ठ पुत्र नहीं देंगी। पत्नी ने कहा कि जयेष्ठतम पुत्र प्रायः
अपने पिता का और कनिष्ठतम पुत्र अपनी मां का लाडला होता है। तब मझले
पुत्र शुनःशेप ने कहा, ‘उस दशा में मैं समझता हूं कि मझला पुत्र ही दिए जाने
योग्य है। अतः तुम मुझे ले चलो।’ तब एक करोड़ स्वर्ण मुद्रा, रत्नों के ढेर तथा
एक लाख गायें दी गईं और शुनःशेप को लेकर चल दिए। जब वे पुष्कर से गुजर
रहे थे तो शुनःशेप ने अपने मामा विश्वामित्र को देखा, जो अन्य ट्टषियों के साथ
वहां तप कर रहे थे। वह यह कहकर उनकी गोद में गिर पड़ा कि वह अनाथ,
मित्ररहित और असहाय, ट्टषि की दया का पात्र है और उसने उनसे सहायता की
याचना की। विश्वामित्र ने उसे धीरज बंधाया और अपने पुत्रों से आग्रह किया कि
वे शुनःशेप के स्थान पर बलि के लिए जाए। इस पर राजर्षि के मधुष्यांद आदि
पुत्रों ने असहमति व्यक्त की, और उदंडता और तिरस्कारपूर्वक बोले, ‘यह कैसा
आचरण है कि आप अपने पुत्रों की बलि और दूसरे के पुत्रों की रक्षा कर रहे
हैं। हम इसे अकर्तव्य समझते हैं और यह अपना मांस खाने जैसा ही है।’ अपनी
आज्ञा की अवमानना होते देख मुनि अत्यंत क्रुद्ध हो गए और उन्होंने पुत्रों को शाप
दे दिया, ‘जाओ वशिष्ठ के पुत्रों की भांति तुम्हारा जन्म भी एक सहस्त्र वर्षों तक
अत्यंत नीच जाति में हो और तुम कुत्ते का मांस खाओ।’ फिर उन्होंने शुनःशेप
से कहा, जब तुम्हें अंबरीश के यज्ञ में कुश आदि के पवित्र पाशों में बांध तुम्हारे
ऊपर लाल रंग की माला डाल और चंदन का लेप कर विष्णु के यज्ञ स्तंभ से
बांध दिया जाए, तब तुम अग्नि को संबोधित कर इन दो दिव्य गाथाओं का गान
करना। इससे तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी।’ दोनों गाथाएं प्राप्त करते ही शुनःशेप ने
राजा अंबरीश से तुरंत गंतव्य की ओर प्रस्थान करने के लिए कहा। जब शुनःशेप
को लाल वस्त्र पहना कर बलि के लिए स्तंभ से बांध दिया गया, तब उसने इंद्र