स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
97
और उनके छोटे भाई (विष्णु) की स्तुति की। सहस्त्रक्षि (इंद्र) गुप्त मंत्रों को सुन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने शुनःशेप की दीर्घायु प्रदान की। राजा अंबरीष को भी इस यज्ञ के फलस्वरूप भारी पुण्यों की प्राप्ति हुई। इसके बाद विश्वामित्र पुनः अपनी तपस्या में लग गए और एक हजार वर्ष तक घोर तप करते रहे।
एक हजार वर्ष पूरे होने पर देवता विश्वामित्र के पास उन्हें तपस्या का फल देने के लिए आए। ब्रह्मा ने घोषणा की कि उन्होंने ट्टषि का पद उन्नति स्परूप प्राप्त कर लिया है। स्पष्टतः मुनि इससे संतुष्ट नहीं हुए और पुनः तपस्या में लग गए। इस प्रकार वह बहुत समय तक तपस्या करते रहे। एक बार इसी बीच उन्होंने अप्सरा मेनका को देखा, जो पुष्कर झील में स्नान करने के लिए आई हुई थी। वह उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो गए। वह अपूर्व लावण्यमयी थी, जैसे बादलों में बिजली हो। उन्होंने उसे अपने आश्रम में साथ रहने के लिए बुला लिया। वह दस वर्ष तक मेनका के सम्मोहन से ग्रस्त रहे। इससे उनकी तपस्या में महान विघ्न पड़ा। वह अपनी इस अधम स्थिति पर बड़े लज्जित हुए। वह यह सोचकर कि यह सब मेरी तपस्या भंग करने के लिए देवताओं की चाल है, क्रुद्ध हो उठे। फिर उन्होंने समझा-बुझा कर अप्सरा को विदा किया और वह उत्तरी पर्वतमाला पर चले गए, जहां उन्होंने कौशिकी नदी के तट पर एक हजार वर्ष तक घोर तपस्या की। वह अपनी तपस्या में जो प्रगति कर रहे थे, उसे देखकर देवता भयभीत हो उठे। उन्होंने विश्वामित्र को महर्षि की पदवी देने का निर्णय किया। ब्रह्मा ने प्रायः सभी देवताओं की ऐसी इच्छा को ध्यान में रख उन्हें महर्षि का पदवी घोषित कर दी। विश्वामित्र हाथ जोड़ प्रणाम करके बोले, ‘जब मुझे ब्रह्मर्षि का अनुपम पद प्रदान किया जाएगा, तभी मैं अपने आपको जितेंद्रिय समझूंगा।’ तब ब्रह्मा ने उनसे कहा, ‘तुमने अभी अपनी इंद्रियों को पूरा तरह अपने वश में करने की शक्ति नहीं प्राप्त की है। इसके लिए और प्रयास करो।’ तब विश्वामित्र ने पुनः और भी घोर तपस्या प्रारंभ कर दी। वह दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर बिना किसी आधार के खड़े होकर केवल वायु पीकर तथा ग्रीष्म ट्टतु में पंचाग्नि (अर्थात् एक-एक चारों दिशाओं और सिर पर सूर्य) के बीच, वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे और जाड़ों में दिन-रात पानी में खड़े रहकर तप करने लगे। इस प्रकार उन्होंने एक हजार वर्षों तक लगातार घोर तपस्या की। अंततः इंद्र और अन्य देवता विश्वामित्र को इस प्रकार पुण्य और तेज का संग्रह करते देख संत्रस्त हो उठे और देवताओं के राजा इंद्र ने अप्सरा रंभा से मुनि को अपने रूप तथा हाव-भाव से लुब्ध करने के लिए कहा। रंभा ने विकट स्वभाव के मुनि के क्रोध से सामने जाने से आनाकानी की, लेकिन इंद्र के बार-बार आग्रह करने पर वह तैयार हो गई। इंद्र ने वचन दिया कि वह और कंदर्प (प्रेम