5. जातिप्रथा का अभिशाप - Page 128

जातिप्रथा का अभिशाप

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(111) लडाइगिर, (112) प्यल, (113) कइब, (114) छत्री, (115) बन्टि, (116) वातुलु, (117) खइर, (118) बास, (119) पइट, (120) सबेज, (121) डंड, (122) रावल, (123) मिसिर, (124) सिव्ब, (125) सिंगअर, (126) मिजऱ्, (127) मल, (128) वारिक, (129) जान, (130) लुतिर, (131) पारिभ, (132) हइल, (133) नकब, (134) मुंइन, (135) अम्बारदार, (136) बरवल, (137) केंठ, (138) बाली, (139) जंगली, (140) डुल, (141) परव, (142) हरकार, (143) गागर, (144) पंडित, (145) जारी, (146) लांगी, (147) मुक्की, (148) बीही, (149) पडौर, (150) पाडे, (151) जांद, (152) टेंग, (153) टूंड, (154) दराबी, (155) दराल, (156) फम्ब, (157) सज्जोल, (158) बख्शी, (159) उग्र, (160) निचिव, (161) पठान, (162) विचारी, (163) ऊंठ, (164) कुचारी, (165) शाल, (166) बइब, (167) मखानी, (168) लाबिर, (169) खान, (170) खानकिट, (171) शाह, (172) पीर, (173) खरिद, (174) खइंक, (175) कल्पोश, (176) पिशन, (177) बिशन, (178) बुल, (179) च्युक, (180) चक, (181) रेइ, (182) प्रुइत, (183) पइट, (184) किचिल, (185) कहि, (186) जिजि, (187) किलमाक, (188) सलमान, (189) कदलबुज, (190) कंधारी, (191) बाली, (192) मनाटी, (193) बान्खन, (194) हकीम, (195) गरीब, (196) मंडल, (197) मंझ, (198) शइर, (199) नून, (200) तेली, (201)

खलासी, (202) चन्द्र, (203) गदिइर, (204) जरेब, (205) सिहिर, (206) कल्विट, (207) नगरी, (208) मंगुविच, (209) खैबारी, (210) कुअल, (211) कइब, (212) ख्वस, (213) दुर्रानी, (214) तुली, (215) गरीब, (216) गाढी, (217) जती, (218) राक्सिस, (219) हरकार, (220) ग्रट, (221) वागिर, आदि आदि।

सिंध के सारस्वत

सिंध के सारस्वतों का उप-विभाजन इस प्रकार हैः

(1) शिकारपुरी, (2) बारोवी, (3) रवनजाही, (4) शैतपाल, (5) कुवा चांद, (6) पोखरन।

2. कान्यकुब्ज ब्राह्मण

कान्यकुब्जों का नाम कन्नौज नगर पर पड़ा है, जो .... साम्राज्य की राजधानी था। इन लोगों को कनौजिए भी कहते हैं। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के दो नाम हैं। एक सरवरिया कहलाते हैं, तो दूसरे कान्यकुब्ज। सरवरिया ब्राह्मणों का नाम प्राचीन नदी सरयू पर पड़ा है, जिसके पूर्व में मुख्यतः पाए जाते हैं। वह कनौजियों की प्रांतीय शाखा है