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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास
I. अस्पृश्यों की संख्या काफी समय तक अज्ञात रही,
II. सन् 1911 की जनगणना और पृथक गणना का पहला प्रयास,
III. सन् 1911 की जनगणना के निष्कर्षों की पुष्टि,
IV. लोथियन कमेटी और हिंदुओं का कोई ‘अस्पृश्य नहीं’ का नारा,
V. इस नारे के कारण, और
VI. पिछड़े वर्गों तथा मुस्लिमों का रवैया।
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भारत के अस्पृश्यों की कुल आबादी कितनी है? जो व्यक्ति इन लोगों के बारे में कुछ जानना चाहेगा, उसका निश्चय ही पहला सवाल यही होगा। अब तो इस सवाल का जवाब आसानी से दिया जा सकता है। 1931 की भारत की जनगणना के अनुसार उनकी आबादी पांच करोड़ थी। जहां अब यह संभव है कि भारत में अस्पृश्यों की आबादी के बारे में कमोबेश सही आंकड़े दिए जा सकें, वहीं पहले काफी समय तक ऐसा करना संभव नहीं था।
इसके अनेक कारण थे। पहला कारण तो यह था कि अस्पृश्यता कोई कानूनी शब्द नहीं है। अस्पृश्यता की ऐसी कोई सटीक कानूनी परिभाषा नहीं है कि उसके द्वारा यह परिभाषित किया जा सके कि कौर अस्पृश्य है और कौन नहीं है। अस्पृश्यता एक सामाजिक धारणा है, जिसने एक प्रथा का रूप ले लिया है और चूंकि प्रथा का अलग-अलग रूप होता है, अतः वही दशा अस्पृश्यता की है। इसलिए इस बारे में सदा ही कुछ-न-कुछ कठिनाई आ रही है कि निश्चित गणितीय मापदंड के अनुसार अस्पृश्यों की आबादी का आकलन किया जा सके। दूसरे, स्वर्ण हिंदू सदा ही इस