122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बात का तीव्र विरोध करते रहे हैं कि जनगणना रिपोर्ट के लिए जाति के अनुसार गणना की जाए। उनका आग्रह रहा है कि अनुसूचियों के लिए जाति संबंधी सवाल को न उठाया जाए और जाति तथा जनजाति के आधार पर जनसंख्या का वर्गीकरण न किया जाए। 1901 की जनगणना के बारे में इसी आशय का प्रस्ताव किया गया था। उसका मुख्य आधार था कि जनसंख्या में विभिन्न जातियों तथा जनजातियों का विभाजन लंबे अंतरालों के बाद बदलता है और यह जरूरी नहीं है कि हर दस साल के बाद होने वाली जनगणना में उनके आंकड़े प्राप्त किए जाएं।
जनगणना आयुक्त पर आपत्ति के इन आधारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आयुक्त के विचार में जाति के अनुसार गणना महत्वपूर्ण और आवश्यक थी। जनगणना आयुक्त की दलील थीः
सामाजिक संस्था के रूप में जाति के गुण-दोषों के बारे में चाहे कुछ भी
कहा जाए, परंतु यह स्वीकार करना असंभव है कि भारत में जनसंख्या संबंधी
समस्या पर कोई भी विचार-विमर्श जिसमें जाति एक महत्वपूर्ण मुद्दा न हो,
लाभप्रद हो सकता है। भारतीय समाज का ताना-बाना अभी जाति-व्यवस्था पर
आधारित है और भारतीय समाज के विभिन्न स्तरों में परिवर्तन का निर्धारण अभी
भी जाति के आधार पर होता है। प्रत्येक हिंदू (यहां इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में
किया जा रहा है) जाति में जन्म लेता है, उसकी वह जाति ही उसके धार्मिक,
सामाजिक, आर्थिक, और पारिवारिक जीवन का निर्धारण करती है। यह स्थिति
मां की गोद से लेकर मृत्यु की गोद तक रहती है। पश्चिमी देशों में समाज के
विभिन्न स्तरों का निर्धारण, चाहे वह आर्थिक हो, शैक्षिक हो या व्यावसायिक
हो, जिन प्रधान तत्वों के द्वारा होता है, वे अदलते-बदलते रहते हैं, वे उदार
होते हैं और उनमें जन्म और वंश की कसौअी को बदलने की प्रवृत्ति होती है।
भारत में आध्यात्मिक, सामाजिक, सामुदायिक तथा पैतृक व्यवसाय सबसे बड़े
तत्व हैं, जो अन्य तत्वों की अपेक्षा प्रधान तत्व होते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों
में जहां जनगणना के समय आर्थिक अथवा व्यावसायिक वर्ग के आधार पर
आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, वहां भारत में जनगणना के समय धर्म और जाति
का ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रव्यापी और सामाजिक संस्था के रूप मे जाति के
बारे में कुछ भी क्यों न कहा जाए, इसकी उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं होगा
और जब तक समाज में किसी व्यक्ति के अधिकार और उसके पद की पहचान
जाति के आधार पर की जाती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हर
दस साल के बाद होने वाली जनगणना से इस अवांछनीय संस्था के स्थाई होते
जाने में सहायता मिलती है।