करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास 139
लोगों का ध्यान गया है, जिन्हें इस विषय के अध्ययन का अवसर मिला है। बंगाल के जनगणना आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा हैः
(उद्धरण पांडुलिपि में दर्ज नहीं है µ संपादक)
हिंदू इन तथ्यों से भली-भांति अवगत हैं और वे मुस्लिमों के खिलाफ उन्हें उद्धृत करने के लिए पूर्णतया तैयार थे, यदि मुस्लिम हद से आगे बढ़कर संख्या के इस संघर्ष में अस्पृश्यों का साथ देते और उसके कारण विधान-मंडल में सवर्ण हिंदुओं की सीटें घट जातीं। मुसलमान अपने कमजोर पक्षों को जानते थे। वे नहीं चाहते थे कि हिंदुओं को बहाना मिले और वे मुसलमानों के बीच सामाजिक फूट को भड़काएं। उन्होंने सोचा कि उनका सर्वोत्तम हितसाधन तटस्थ रहने में होगा।
इस प्रकार अपनी संख्या के संघर्ष में अस्पृश्य अकेले पड़ गए। लेकिन उन पर भी ध्येयपूर्ति के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता था। जब हिंदुओं ने देखा कि वे अस्पृश्यों की संख्या घटाने में सफल नहीं हो सकते, तो उन्होंने अस्पृश्यों को गुमराह करने की कोशिश की। वे अस्पृश्यों से कहने लगे कि सरकार अस्पृश्य जातियों की सूची तैयार कर रही है और ऐसी सूची में किसी जाति का नाम दर्ज कराना गलत होगा, क्योंकि इससे उन पर सदा के लिए अस्पृश्यता का ठप्पा लग जाएगा। उनकी सलाह मानकर अनेक जातियों ने जो वास्तव में अस्पृश्य जातियां थीं, याचिका भेजकर कहा कि वे अस्पृश्य वर्ग की नहीं हैं और उनका नाम सूची में दर्ज न किया जाए। ऐसी याचिकाओं को वापस ले लिए जाने की प्रेरणा देने के लिए ऐसी जातियों से काफी माथापच्ची करनी पड़ी। उन्हें सूचित किया गया कि असली उद्देश्य उनकी संख्या का आकलन करने का है, ताकि विधान-मंडल में उनकी सीटों की संख्या तय की जा सके।
सभी के लिए सौभाग्य की बात है कि यह संघर्ष और विवाद अब समाप्त हो चुका है। अब अस्पृश्यों की संख्या के बारे में कभी भी विवाद नहीं उठाया जा सकता। अब कानूनी तौर पर अस्पृश्यों की परिभाषा कर दी गई है। कौन अस्पृश्य हैं, इसकी व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम, 1935 की एक अनुसूची में कर दी गई है और उसमें उन्हें अनुसूचित जातियों के रूप में दर्शाया गया है। लेकिन संघर्ष हिंदू चरित्र की प्रवृत्ति को उजागर करता है। यदि अस्पृश्य कोई आवाज नहीं उठाता तो हिंदू उसकी दशा पर लज्जित नहीं होता और उनकी संख्या के बारे में उदासीन रहता है। चाहे वे हजारों में हों या करोड़ों में, उसे इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन यदि अस्पृश्य आवाज उठाते हैं और मान्यता की मांग करते हैं, तो वह इसके लिए कमर कस लेता है कि उनके अस्तित्व को नकार दें, अपने दायित्व को न ओढ़े, अपने अधिकार का बंटवारा न करे और दया तथा ममता से किनारा कर ले।