6. करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास - Page 153

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पिछड़े लोगों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जाए। उस प्रयास मे अस्पृश्य उनका समर्थन करते। लेकिन वे इसके लिए सहमत नहीं हुए और आग्रह करते रहे कि उन्हें दलित वर्गों में शामिल किया जाए। उसका मुख्य कारण यह था कि उनका विचार था कि यह उनके उद्देश्य को पूरा करने का आसान तरीका था। लेकिन चूंकि अस्पृश्यों ने इसका विरोध किया, अतः पिछड़े वर्ग विमुख हो गए और उन्होंने हिंदुओं से भी अधिक उग्र रूप से अस्पृश्यों के अस्तित्व को नकारने में हिंदओं का साथ दिया।

स्पृश्यों और अस्पृश्यों के इस संघर्ष में अस्पृश्यों को मुसलमानों से कोई समर्थन नहीं मिला। इस ओर ध्यान देना होगा कि पंजाब प्रांत की मताधिकार कमेटी में केवल एक मुसलमान ने अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के उस आग्रह का समर्थन किया कि पंजाब में ऐसी जातियां हैं, जिन्हें अस्पृश्य माना जाता है। कमेटी के शेष मुस्लिम सदस्यों ने समर्थन नहीं किया। बंगाल में बंगाल प्रांत की मताधिकार कमेटी के हिंदू तथा मुस्लिम सदस्य इस बारे में सहमत हो गए कि वे इस मामले पर कोई विचार व्यक्त नहीं करेंगे। यह कैसी अजीब बात है कि मुसलमान सदस्यों ने चुप्पी साध ली। यह तो उनके हित में था कि अस्पृश्यों को पृथक राजनीतिक समुदाय के रूप में स्वीकार किया जाए। स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों का यह अलगाव उनके हित में था। संख्या-वृद्धि के इस संघर्ष में मुसलमानों ने अस्पृश्यों की क्यों मदद नहीं की? मुसलमानों के इस रवैए के दो कारण थे। एक तो यह है कि मुसलमान अपनी आबादी के अनुपात से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे। भारत की राजनीतिक शब्दावली के अनुसार वे अधिप्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे। वे जानते थे कि उनके अधिप्रतिनिधित्व से निश्चय ही हिंदुओं को घाटा होगा और प्रश्न केवल यह था कि हिंदुओं का कौन-सा वर्ग वह घाटा उठाए। स्पृश्य हिंदू इस अधिप्रतिनिधित्व की परवाह नहीं करेंगे, यदि वह उनके हिस्से में कमी किए बिना दिया जा सके। समस्या यह थी कि इसे कैसे किया जाए, और इसका एकमात्र रास्ता यही था कि अस्पृश्यों का हिस्सा कम कर दिया जाए, हिस्सा कम करने का अर्थ था, संख्या को कम करना। एक कारण तो यह है, जिसकी वजह से संख्या के इस संघर्ष में मुसलमानों ने अस्पृश्यों का साथ नहीं दिया। दूसरा कारण यह था कि मुसलमानों को डर था कि हिंदू उनका पर्दाफाश कर देंगे। यद्यपि इस्लाम एक ऐसा धर्म है, जो जाति और रंग को लांघकर अलग-अलग लोगों को भाईचारे की डोर में बांध सकता है, फिर भी भारत में इस्लाम भारतीय मुसलमानों में से जाति को निर्मूल करने में सफल नहीं हो सका है। मुसलमानों में जातीयता की भावना उतनी उग्र नहीं है, जितनी की हिंदुओं में है। लेकिन यह असलियत है कि उनमें वह भावना है। मुसलमानों में इस जातीयता की भावना से सामाजिक वर्गीकरण होता है और यह भारत में मुस्लिम संप्रदाय की विशिष्टता है, इस ओर उन सभी