7
अस्पृश्यों का विद्रोह
हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध अस्पृश्यों के आंदोलन के पीछे, खासकर महाराष्ट्र में, एक लंबी इतिहास रहा है। इस इतिहास को दो चरणों में बांटा जा सकता है। प्रथम चरण में याचिकाओं और प्रतिरोधों का जोर था। दूसरे चरण में स्थापित हिंदू-व्यवस्था के विरुद्ध सीधी कार्यवाही के रूप में खुला विद्रोह है। रवैए में यह परिवर्तन दो परिस्थितियों के कारण आया। एक तो इस अनुभूति के कारण आया कि याचिकाएं और प्रतिरोध हिंदुओं पर प्रभाव नहीं डाल सके। दूसरा कारण यह था कि सरकारों ने यह ऐलान कर दिया कि सभी सार्वजनिक सुविधाएं और सार्वजनिक संस्थाएं अस्पृश्यों समेत सभी के लिए खुली हैं। औरों के साथ-साथ ब्रिटिश भारत का कानून अस्पृश्यों को भी कुछ अधिकार देता है। उनमें यह अधिकार भी है कि वे जैसा चाहें कपड़ा या गहना पहनें। इनमें सार्वजनिक सुविधाओं और संस्थाओं के उपयोग के अधिकार भी जोड़ दिए गए, जैसे कुओं, स्कूलों, बसों, ट्रामों, रेलगाडि़यों, सरकारी कार्यालयों आदि के उपयोग में अब कोई संशय नहीं रह गया था। लेकिन हिंदुओं के विरोध के कारण अस्पृश्य उनका उपयोग नहीं कर सके। इस स्थिति का सामना करने के लिए अस्पृश्यों ने तरीकों को बदलने का फैसला किया। उन्होंने बुराइयों को मिटाने के लिए सीधी कार्यवाही करने का निश्चय किया। 1920 के आसपास यह परिवर्तन आया।
I
सीधी कार्यवाही के प्रयासों में से केवल कुछ का उल्लेख किया जा सकता है। उससे हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध अस्पृश्यों के विद्रोह का आभास हो जाएगा। सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार प्राप्त करने के लिए जो प्रयास किए गए, उनमें एक का उल्लेख करना काफी होगा। इस संबंध में सर्वाधिक उल्लेखनीय प्रयास 1924 में ट्रावनकोर स्टेट के अस्पृश्यों ने किया। वह वाइकोम मंदिर के इर्दगिर्द बनी सड़कों के इस्तेमाल के बारे में था। ये सार्वजनिक सड़कें थीं। हर कोई उनका