7. अस्पृश्यों का विद्रोह - Page 164

अस्पृश्यों का विद्रोह

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( v ) हिंदुओं को जन्मसिद्ध अधिकारों के अलावा उनके अन्य अधिकारों से

केवल कानून द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। कानून जिसका निषेध

नहीं करता, उसे करने की पूरी छूट हिंदू को होनी ही चाहिए और कानून

जिसे बाध्यकारी नहीं ठहराता, उसे करने के लिए हिंदू को बाध्य नहीं

किया जाना चाहिए। इस कारण व्यक्तियों के लिए ऐसी कोई रोक ही नहीं

होनी चाहिए कि वे सार्वजनिक मंदिरों तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं

का उपयोग नहीं कर सकते। जिन मामलों पर कानून ने रोक नहीं लगाई

है, उनमें जो रोक लगाते हैं, वे सम्मेलन की राय में जन-शत्रु हैं।

( vi ) कानून किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का आदेश नहीं है। कानून तो

परिवर्तन के लिए जनादेश है। ऐसी स्थिति में श्रद्धास्पद कानून को सबकी

सहमति से ही बनाया जाए और निश्चय ही उसे बिना किसी भेदभाव

के सब पर लागू किया जाए। जरूरी होने पर सामाजिक विभाजन समाज

के हित में किए जा सकते हैं, लेकिन उसका एकमात्र आधार योग्यता

(कर्म) हो, न कि जन्म। यह सम्मेलन हिंदू समाज-व्यवस्था का खंडन

एक तो इस आधार पर करता है कि वह समाज का अहित करती है।

दूसरा आधार यह है कि वह जन्म पर आधारित है। तीसरा यह कि उसे

कोई जनादेश प्राप्त नहीं है।

संकल्प संख्या 2 µ ‘मनुस्मृति’ की प्रति को भस्म करने की घोषणा

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि हिंदुओं के लिए संहिता के रूप में मान्य ‘मनुस्मृति’ में जो नियम दिए गए हैं, और जिनकी घोषणा हिंदू कानून के निर्माता मनु के नाम से की जाती है, वे मानव मात्र को उसके अधिकारों से वंचित करते हैं और उसके व्यक्तित्व को रौंदते हैं। समूचे सभ्य जगत में मान्य मानव अधिकारों से उनकी तुलना करते हुए इस सम्मेलन की राय है कि इस ‘मनुस्मति’ का आदर नहीं होना चाहिए और उसे पवित्र पुस्तक भी नहीं कहा जाना चाहिए तथा उसके प्रति घोर घृणा और अनादर व्यक्त करने के लिए यह सम्मेलन उसकी एक प्रति को भस्म करने का संकल्प करता है। यह कार्य सम्मेलन की समाप्ति पर धर्म की आड़ में सामाजिक असमता को बनाए रखने वाली प्रथा के प्रतिरोध में होगा।

इन संकल्पों को सरसरी तौर पर देखने से ही पता चल जाएगा कि सम्मेलन ने किस नीति को अपनाया। भले ही सम्मेलन अन्याय-विशेष को दूर करने के लिए हुआ था, फिर भी उसने दिखा किया कि वह छोटे-मोटे अन्यायों के प्रतिकार से ही संतोष नहीं कर लेगा। सम्मेलन को लगा कि अब समय आ गया है कि अस्पृश्यों के लक्ष्य