7. अस्पृश्यों का विद्रोह - Page 163

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जाने कि मानव के ये जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं, वह यह देखने का प्रयास करे कि मानव और मानव तथा वर्ग और वर्ग के बीच इस संघर्ष में वे पैरों तले कुचले न जाएं। हो सकता है कि हर हिंदू को यह पता न हो कि सम्मेलन की राय में मानव के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं। अतः यह सम्मेलन संकल्प करता है कि वह उनकी सूची वाली निम्न उद्घोषणा जारी करे µ

( i ) सभी हिंदुओं की सामाजिक हैसियत जन्म से एक जैसी होती है। सामाजिक

हैसियत की यह समता उनका एक ऐसा गुण है, जो मृत्यु-पर्यन्त बना

रहता है। हो सकता है कि समाज में उनके कृत्यों की दृष्टि से उनमें

विभेद और अंतर हो। लेकिन उनके करण उनकी हैसियत में कोई अंतर

नहीं होने चाहिएं। अतः यह सम्मेलन ऐसे किसी भी कार्य का विरोध

करता है, भले ही वह जीवन के राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक

क्षेत्र में हों, जिसके कारण सामाजिक हैसियत में अंतर पैदा होता हो।

( ii ) सभी राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक परिवर्तनों का अंतिम लक्ष्य

यही होना चाहिए कि सभी हिंदुओं की समान हैसियत ज्यों की त्यों बनी

रहे। सम्मेलन का यह दृष्टिकोण है, अतः वह हिंदुओं के ऐसे समूचे

साहित्य का, चाहे वह प्राचीन हो या आधुनिक, घोर विरोध करता है, जो

हिंदू समाज-व्यवस्था में व्याप्त असमानता के घृणित सिद्धांत को किसी

भी प्रकार समर्थन करता है।

( iii ) समस्त सत्ता की स्रोत है, जनता। किसी व्यक्ति अथवा वर्ग का विशेषाधिकारों

का दावा तब तक वैध नहीं होता, जब तक उसे जनता मान्यता न

दे। अतः यह सम्मेलन हिंदुओं के कुछ वर्गों को प्राप्त सामाजिक तथा

धार्मिक विशेषाधिकारों का खंडन करता है, क्योंकि वे वेदों, स्मृतियों और

पुराणों पर आधारित हैं, न कि स्वतंत्र लोक-मत पर।

( iv ) हर व्यक्ति का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि उसे काम करने और बोलने

की आजादी हो। इस आजादी पर केवल इसलिए अंकुश लगाया जा सकता

है कि उसकी आजादी किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार में बाधा न डाले।

इसके अलावा यह अंकुश केवल जनादेश से लगाया जा सकता है, हिंदू

शास्त्रों की किसी निषेधाज्ञा से नहीं। अतः सम्मेलन धार्मिक, सामाजिक

एवं आर्थिक आजादी संबंधी उन सभी प्रतिबंधों का खंडन करता है, जो

हिंदुओं के विचार और कर्म पर लगाए गए हैं, क्योंकि उन्हें शास्त्रों ने

लगाया है, जनता ने नहीं।