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असहाय स्थिति

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कबीले से ‘न्याय’ की गुहार नहीं कर सकता। एक कबीले के साथ दूसरे कबीले के संबंध युद्ध या मैत्री के संबंध समझे जाते थे, न कि किसी कानून के संबंध। और जो व्यक्ति किसी कबीले का नहीं होता था, वह ‘बाहरी’ समझा जाता था... असलियत में और नाम से भी। इसलिए बाहरी व्यक्तियों के विरुद्ध कानून की अनदेखी कर व्यवहार करना कानून में जायज था। चूंकि अस्पृश्य व्यक्ति स्पृश्यों के वर्ग का सदस्य नहीं है, इसलिए वह बाहरी व्यक्ति है। उससे उनका कोई संबंध नहीं है। वह कानून के लाभ से बहिष्कृत व्यक्ति है। वह ऐसे न्याय अथवा अधिकार की मांग नहीं कर सकता, जिसे स्पृश्य के लिए आदर की दृष्टि से देखना अनिवार्य है।

तीसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच निश्चित संबंध होते हैं। यह हैसियत का सवाल बन गया है। निश्चय ही इस कारण स्पृश्यों के मुकाबले अस्पृश्यों को हीन स्थिति में रखा गया है। यह हीनता सामाजिक आचार-संहिता में वर्णित है और अस्पृश्यों को उसका पालन करना ही चाहिए। वह संहिता कैसी है, उसका उल्लेख किया जा चुका है। अस्पृश्य उसका पालन नहीं करना चाहता। वह यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि जिसके पास लाठी है, भैंस भी उसी की है। अस्पृश्य चाहते हैं कि स्पृश्यों के साथ उनके संबंध किसी सहमति पर आधारित हों। लेकिन स्पृश्य चाहते हैं कि अस्पृश्य निश्चित दर्जे के नियमों के अनुसार चलें और उससे ऊपर उठने की कोशिश न करें। इस प्रकार गांव के दो वर्ग, अर्थात् स्पृश्य और अस्पृश्य, उस व्यवस्था को पुनः व्यवस्थित करने के लिए संघर्षरत हैं, जिसे स्पृश्य समझते हैं कि यह हमेशा के लिए निर्णीत हो चुकी है। यह संघर्ष इस प्रश्न को लेकर है कि इस संबंध का आधार क्या हो? क्या इसका आधार कोई समझौता हो या उसका आधार हैसियत को माना जाए?

यही वह प्रश्न है, जिसने हिंदुओं को उत्तेजित कर रखा है। अस्पृश्यों के विद्रोह को हिंदू इस दृष्टि से नहीं देखता कि यह अस्पृश्यों का अपनी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए एक प्रयास है। हिंदू का विचार है कि यह प्रयास उसके विरुद्ध है और उसकी बराबरी पर आने का प्रयास है। यही उसके विरोध का कारण है।

II

हिंदुओं का प्रतिरोध सोचा-समझा प्रतिरोध है। वे इस विद्रोह को हर हालत में दबा देना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ भी करने और किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हैं। अस्पृश्यों के विद्रोह का जवाब हिंदुओं ने भी अपने आक्रमण के पत्थर से दिया है। अस्पृश्यों के इस विद्रोह का दमन हिंदुओं ने कितनी क्रूरता से किया है, वह एक दो उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा।