8. असहाय स्थिति - Page 171

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

काननी तौर पर राजस्व प्रशासन या डाक संदेश के लिए अस्पृश्यों के घर गांव का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन असलियत में वह गांव से अलग होते हैं। गांव में रहने वाला हिंदू जब गांव की बात करता है तो उसका आशय उसमें केवल सवर्ण हिंदू निवासियों को शामिल करना होता है, जो स्थानीय रूप से वहां रहते हैं। इसी प्रकार जब कोई अस्पृश्य गांव की बात करता है तो उसका आशय उस गांव में से अस्पृश्यों और उनके घरों से रहित गांव होता है। यह जरूरी नहीं कि इन दोनों को मिलाकर ही गांव बने। इस प्रकार हर गांव में अस्पृश्यों के दो अलग-अलग समूह होते हैं। उनमें कोई समानता नहीं होती। उनका एकल जनसमूह नहीं होता। यह पहली ध्यान देने योग्य बात है।

गांव में इस प्रकार के विभाजन के बारे में दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये समूह स्वंय में अलग-थलग एक इकाई होते हैं और कोई भी एक-दूसरे को अपने में शामिल नहीं करता। यह ठीक ही कहा गया है कि अमरीका या यूरोप में रहने वाला व्यक्ति विभिन्न प्रकार के समूहों का होता है और वह उनमें से अधिकांश का सदस्य बनता है। वह निश्चय ही एक परिवार में जन्म लेता है, लेकिन वह उस परिवार में सारी जिंदगी रहने के बजाए जब तक चाहे तभी तक उस परिवार मे रहता है। वह कोई भी व्यवसाय या कोई भी निवास स्थान चुन सकता है, किसी के भी साथ विवाह कर सकता है, किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकता है। वह किसी दूसरे के द्वारा किए गए कार्य के बजाए केवल अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है। वह पूर्ण अर्थ में ‘व्यक्ति’ होता है, क्योंकि उसके सभी संबंध और सभी कार्य उसी के द्वारा अपने लिए निर्धारित होते हैं। लेकिन स्पृश्य अथवा अस्पृश्य व्यक्ति किसी भी अर्थ में ‘व्यक्ति’ नहीं होता, क्योंकि उसके सभी या लगभग सभी संबंध तभी निश्चित हो जाते हैं, जब उसका जन्म किसी वर्ग-विशेष में हो जाता है। उसका व्यवसाय, उसका निवास उसकी राजनीति, आदि सभी-कुछ उस वर्ग द्वारा उसके लिए निश्चित हो जाते हैं, जिसमें उसका जन्म हो गया होता है। ये स्पृश्य और अस्पृश्य व्यक्ति एक-दूसरे से जब मिलते हैं तो इस तरह नहीं मिलते जैसे एक इंसान दूसरे इंसान से मिल रहा होता है, बल्कि वे ऐसे मिलते हैं जैसे एक समुदाय का व्यक्ति दूसरे समुदाय से या दो विभिन्न राष्ट्रों के व्यक्ति आपस में मिल रहे हों।

गांव में स्पृश्यों और अस्पृश्यों के आपसी संबंधों पर इस बात का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। यह संबंध उन्हीं के सदृश होते हैं जैसे आदिम-काल में दो विभिन्न कबीलों के बीच होते थे। आदिम समाज में एक कबीले के व्यक्ति यह दावा करते थे कि वही हर चीज के अधिकारी हैं और बाहरी व्यक्ति के रूप में बाहरी व्यक्ति के ऊपर कृपा तो की जा सकती है, लेकिन वह अपने कबीले के अलावा किसी अन्य