असहाय स्थिति
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लौटें, उन्हें दंउ दिया जाए। इस आदेश के अनुसार सम्मेलन के बाद अपने गांव
पहुंचने से पूर्व या पहुंचने के बाद अनेक महारों पर हमला किया गया। वहां
दलित वर्गों को यह घाटा है कि सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले उनकी संख्या नहीं
के बराबर है। दलित वर्गों के नेताओं ने अधिकारियों से सुरक्षा की अपील की
है और जिला पुलिस अधीक्षक समेत जिला अधिकारी मौके पर जांच-पड़ताल
कर रहे हैं। लेकिन यह कहना ही पड़ेगा कि यदि रेजीडेंट मजिस्ट्रेट दो घंटे के
मूल्यवान समय तक हाथ-पर-हाथ धरकर न बैठा रहता तो संभव था कि दंगे
की नौबत नहीं आती।
कालाराम मंदिर सत्याग्रह के कारण अस्पृश्यों पर जो हमला किया गया, वह भी कम गंभीर नहीं था।
तीसरा उदाहरण अभी हाल का है। वह हमला 1935 में बंबई के प्रेसिडेंसी के अहमदाबाद जिले के धोल्का तालुका में कवीथा नामक गांव में हुआ।
बंबई सरकार ने आदेश जारी किए किए सार्वजनिक स्कूलों में अस्पृश्यों के बच्चे दाखिल किए जाएं। उसके बारे में समाचार है ख्1, ः
आठ अगस्त, 1935 को कवीथा गांव के अस्पृश्य अपने चार बच्चों को स्कूल
में दाखिला कराने के लिए गए। इसे देखने के लिए गांव के बहुत से सवर्ण हिंदू
स्कूल के चारों तरफ जमा हो गए। दाखिले की कार्यवाही शांतिपूर्वक संपन्न हो
गई और कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। लेकिन अगले दिन गांव के सर्वण हिंदुओं
ने अपने-अपने बच्चों को उस स्कूल से हटा लिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि
उनके बच्चे अस्पृश्यों के बच्चों के साथ पढ़ें और उन्हें छूत लग जाए।
उसके कुछ समय पश्चात् एक ब्राह्मण ने गांव के एक अस्पृश्य पर हमला
किया। 12 अगस्त को गांव के अस्पृश्य लोग उस ब्राह्मण के खिलाफ मजिस्ट्रेट
की कचहरी में फौजदारी की शिकायत लिखवाने के लिए धोल्का पहुंचे। जब
गांव के हिंदुओं को पता चला कि अस्पृश्यों के बालिग लोग गांव में नहीं हैं, तो
उन्होंने अस्पृश्यों के घरों पर हमला कर दिया। वे डंडों, भालों और तलवारों से
लैस थे। हमलावरों में सवर्ण हिंदू महिलाएं भी शामिल थीं। उन्होंने अस्पृश्य बूढ़ों
और औरतों को मारना-पीटना शुरू कर दिया।
इनमें से कुछ तो जंगलों में भाग गए, कुछ अपने घरों के भीतर दरवाजे बंद
करके छिप गए। इन हमलावरों ने अपना गुस्सा उन अस्पृश्यों पर उतारा, जिनके
- घटना का यह विवरण उस विवरण का अनुवाद है जो मेरे पास धोल्का के नवयुग मंडल के मंत्री ने
भेजा है।