160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बारे में शक था कि उन्होंने गांव के स्कूल में अपने बच्चों को भर्ती कराने के मामले में अगुवाई की थी। वे दरवाजे तोड़कर भीतर गुस गए और जब घरों के भीतर कोई नहीं मिला, तो उन्होंने घरों की छतों की खपरैल और धन्नियां तहस-नहस कर दीं।
जिन अस्पृश्यों को मारा-पीआ गया, वे आतंकित थे। वे अपने उन बड़े-बूढ़ों की सुरक्षा के बारे में चिंतित थे, जो धोल्का गए हुए थे और उसी रात्रि को लौटने वाले थे। सवर्ण हिंदुओं को तो पता था कि अस्पृश्यों के जो नेता धोल्का गए हुए हैं, वे रात को किसी समय लौटेंगे। अतः वे हथियारों से पूरी तरह लैस होकर अस्पृश्यों पर हमला करने के लिए गांव से बाहर चले गए। वे गांव के रास्ते में झाडि़यों में छिपकर बैठ गए। जब एक अस्पृश्य वृद्धा को इसका पता चला तो वह रात के अंधेरे में छिपकर गांव के बाहर निकल गई। वह गांव वापस आ रहे नेताओं से मिली। उसने उन्हें बता दिया कि सवर्ण हिंदुओं की सशस्त्र टोलियां उनकी घात में छिपी बैठी हैं। अतः उन्हें गांव में नहीं आना चाहिए। उन्होंने यह सोचकर वृद्धा की बात को अनसुनी कर दिया कि उनकी गैर-हाजिरी में तो सवर्ण हिंदू और अधिक जुल्म ढा सकते हैं। साथ ही उन्हें डर था कि यदि वे गांव में गए तो उन पर हमला हो सकता है। अतः उन्होंने फैसला किया कि वे मध्य-रात्रि के बाद तक गांव के बाहर खेतों में प्रतीक्षा करेंगे। इधर सवर्ण हिंदुओं की जो टोलियां घात में बैठी हुई थीं, वे प्रतीक्षा करती रहीं और अंत में वे चली गईं। अस्पृश्यों के नेता गांव में प्रातः कोई तीन बजे के बाद घुसे। यदि वे इससे पूर्व आते और कातिल टोलियों के हत्थे चढ़ जाते, तो हो सकता था कि उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता। जान व माल की क्षति देखकर पौ फटने से पहले ही वे गांव छोड़कर अहमदाबाद के लिए रवाना हो गए और वहां उन्होंने हरिजन सेवक संघ के मंत्री को सूचना दे दी। यह संस्था वही है, जो गांधी ने अस्पृश्यों के कल्याण के लिए स्थापित की है। लेकिन मंत्री भी लाचार था। सवर्ण हिंदुओं ने न केवल मारपीट की, बल्कि उन्होंने ऐसी साजिश भी की कि अस्पृश्यों का जीना दूभर हो जाए। उन्होंने अस्पृश्यों को मजदूरी पर रखने और उन्हें खाने की चीजें बेचने से भी मना कर दिया। वे अस्पृश्यों के मवेशियों को चरने देने से रोकने लग गए हैं और जब-तब मौका पाकर अस्पृश्य औरतों और आदमियों को मारने-पीटने लगे हैं। यही नहीं, अपने उन्माद में सवर्ण हिंदुओं ने उस कुएं में मिट्टी का तेल डाल दिया, जिससे अस्पृश्य अपने पीने का पानी लिया करते हैं। ऐसा उन्होंने कई दिनों तक किया। इसका नतीजा यह हुआ कि गांव के अस्पृश्य पीने के पानी के लिए तरस गए। जब नौबत यहां तक पहुंच गई, तो अस्पृश्यों