सभ्यता या घोर असभ्यता
I . भारत की जनता के विषय में एक और दृष्टिकोण,
II . उसके द्वारा दलित वर्ग का निरूपणः (क) आदिम जनजातियां,
(ख) जरायम-पेशा जातियां, और (ग) अस्पृश्य वर्ग,
III . इन वर्गों की स्थिति पर हिंदू सभ्यता का प्रभाव, और
IV . इन वर्गों की विभिन्न समस्याएं।
आमतौर पर भारत की आबादी का वर्गीकरण भाषाई या धार्मिक आधार पर किया जाता है। भारत के लोगों के वर्गीकरण के ये ही दो आधार हैं, जो काफी अर्से से व्यवहारित होते आ रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप विदेशियों के मन में यह बात बैठ गई है कि भारतवासियों के बारे में जानने योग्य और महत्वपूर्ण बात यह है कि वे किस धर्म का पालन करते हैं और वे कौन-सी भाषा बोलते हैं। इस सीमित दृष्टिकोण के कारण वे भारत में प्रचलित धर्मों और भाषाओं की जानकारी से ही संतुष्ट हो जाते हैं। जिस किसी विदेशी धर्म में रुचि होती है, वह केवल यह बात याद रखता है कि भारत में जो लोग हैं, वे या तो हिन्दू हैं या मुसलमान हैं या वह यह याद रखता है कि भारत में जो लोग बसते हैं, उनमें से कुछ मराठी बोलते हैं, कुछ गुजराती, कुछ बांगला और कुछ तमिल आदि भाषाएं बोलते हैं।
भारत के लोगों के वर्गीकरण के जो आधार हैं, उनमें से धार्मिक वर्गीकरण किसी विदेशी को अधिक प्रभावशाली और आर्कषक लगता है। इसलिए वह भाषाओं के मुकाबले धर्मों में अधिक रुचि लेता है। लेकिन फिर भी वह भारत के सभी धार्मिक संप्रदायों से परिचित नहीं होता है। वह केवल हिंदुओं और मुसलमानों को जानता है। वह कभी-कभी सिखों के बारे में सुनता है, भूले-भटके वह ईसाइयों के बारे में सुनता है, भले ही उनकी संख्या बढ़ती जा रही है, और बौद्धों के बारे में तो उसे कभी कोई जानकारी नहीं हो पाती, जिनका, जहां तक आज के भारत का संबंध है,