6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
निश्चय ही कोई अस्तित्व नहीं है। ख्1,
विदेशियों के मन में यह धारणा बैठ गई है कि भारत मे केवल हिंदू और मुसलमान हैं और अन्य के बारे में सिर खपाने की कोई जरूरत नहीं है। इस प््रकार की धारणा का होना अत्यंत स्वाभाविक है। सारे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगों की चर्चा है। यह स्थिति कितनी गंभीर है, उसका अनुमान तो इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल के वर्षों में कितने अधिक हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए और उनमें कितने अधिक लोग हताहत हुए।
लेकिन यह संघर्ष अपनी-अपनी हुकूमत के लिए संघर्ष है। ऐसे भी हिंदू हैं, जो भारत में हिंदू राज स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मुसलमानों की हैसियत केवल अधीनस्थों की होगी। ऐसे मुसलमान भी हैं, जो सब जगह इस्लाम धर्म के होने का सपना देख रहे हैं। वे भारत को एक मुस्लिम साम्राज्य का अंग बनाना चाहते हैं, जिसमें हिंदुओं के लिए एक ही विकल्प होगा कि व या तो ‘कुरान’ को स्वीकार कर लें या फिर मौत को। इन को कट्टर विचारधारा वाले लोगों के बीच में ऐसे नरम लोग हैं, जो ऐसा राज्य चाहते हैं, जिसमें हिंदू और मुसलमान, दोनों बराबर के साझीदार की भांति रह सकते हैं। यह तो केवल सयम ही बता सकता है कि कौन सफल होगा, कट्टरपंथी या उदारपंथी। फिलहाल अखबारों की सुर्खियां दोनों तरफ से किए जाने वाले खून-खराबों से भरी रहती हैं। लेकिन इस सबके बावजूद मैं यह सोचता हूं कि ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के इस संघर्ष में अधिक दिलचस्पी नहीं है। बहरहाल, यह हुकूमत हासिल करने का संघर्ष है। यह मुक्ति प्राप्त करने का संघर्ष है। यह एक-दूसरे पर हुकूमत हासिल करने का संघर्ष है। उनकी अधिक रुचि उन दलितों के संघर्षों में होगी, जो स्थान प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इंग्लैंड में विगों और टोरियों के बीच पुराने विवाद का वर्णन करते हुए फ्रांसिस प्लेस ने विगों की राजनीतिक नीति के बारे में कहा था कि वे एक ओर राजा को और दूसरी ओर जनता को कुचलना चाहते थे। वे अभिजात वर्ग का शासन चाहते थे। इस समय जो हिंदू तथा मुसलमान संघर्ष कर रहे हैं, वे भारतीय राजनीति में वही नीति अपना रहे हैं। वे अपने-अपने वर्ग को शासक-वर्ग के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जनता चाहे मुसलमान हो या हिंदू, उसका इस्तेमाल तो वर्ग विशेष की स्थापना के लिए केवल हथियार के रूप में किया जाता है। वर्तमान संघर्ष तो वर्गों का संघर्ष है, न कि जनता का।
जिन लोगों की जन-आंदोलनों में रुचि है, उन्हें भारत के लोगों के प्रति एक
- कलकत्ता महाबोधि सोसाइटी उनके पुररुद्धार का अति क्षीण प्रयास कर रही है। (यह तथा अन्य सूचना
भारत की जनगणना, 1931, खंड 1, भाग 3, से ली गई है)।