10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 233

218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रिटिश सरकार किसी समझौते की

संभावना के आधार पर समुदायों पर कोई ऐसी निर्वाचन-सिद्धांत नहीं थोप सकती,

जिसका विरोध वे किसी-न-किसी रूप में करें। अतः यह स्पष्ट है कि यदि कोई

समझौता न हो सके तो अपनी सभी त्रुटियों और कठिनाइयों के बावजूद पृथक

निर्वाचक-मंडलों को ही नए संविधान के अधीन निर्वाचन-व्यवस्था का आधार

माना जाएगा। इसके फलस्वरूप अनुपात का प्रश्न उठेगा। इन परिस्थितियों में

दलित वर्गों की मांगों पर भली-भांति विचार करना ही होगा।

अतः उप-समिति सिफारिश करती है कि सम्मेलन इस राय को दर्ज करे कि

यह वांछनीय है कि जो मांगें की गई हैं, उनके बारे में कोई समझौता हो और संबद्ध

प्रतिनिधियों के बीच वार्ता जारी रहे, और अनुरोध करती है कि इन प्रयासों के नतीजे

की सूचना उन लोगों को दी जाए जो इन वार्ताओं के अगले चरण में जुटे हो।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी उपस्थित नहीं थे, क्योंकि कांगे्रस ने उसका बहिष्कार किया था। वह दूसरे गोलमेज सम्मेलन में आए। वहां दलित वर्गों की इस मांग के बारे में श्री गांधी ने क्या रवैया अपनाया?

सभी आशा करते थे कि श्री गांधी की अधिक रुचि इस बात में होगी कि इन विचार-विमर्शों तथा वार्ताओं के फलस्वरूप जिस संविधान का निर्माण हो, वह ऐसा हो जो भारत को पूर्ण स्वराज, यानी पूर्ण स्वाधीनता दे। वह यह आशा नहीं करते थे कि विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सीटों के बंटवारे जैसे गौण विषय में उनकी रुचि होगी। लेकिन घटनाओं ने इन आशाओं को पूरी तरह झुठला दिया। श्री गांधी ने तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपना संघर्ष ही समाप्त कर दिया। वह भूल गए कि वह पूर्ण स्वराज वाला संविधान प्राप्त करने का आदेश ख्1, लेकर आए थे।

  1. निम्न संकल्प में वह आदेश है, जो कांग्रेस ने श्री गांधी को उस समय दिया था, जब कांग्रेस ने उन्हें

अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना था (यह संकल्प कराची अधिवेशन में पारित हआ था)। कार्यकारिणी

और भारत सरकार के बीच हुए अस्थाई समझौते पर विचार करने के बाद, यह कांग्रेस उसका अनुमोदन

करती है और यह स्पष्ट कर देना चाहती है कि पूर्ण स्वराज, यानी पूर्ण स्वाधीनता का कांग्रेस का लक्ष्य

ज्यों-का-त्यों बना रहता है। यदि कांग्रेस को अन्यथा ऐसा कोई अवसर मिले कि वह किसी सम्मेलन में

ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों के साथ प्रतिनिधित्व कर सके तो कांग्रेस का प्रतिनिधि-मंडल इस लक्ष्य

की पूर्ति के लिए ऐसा विशेष प्रयास करेगा कि राष्ट्र का नियंत्रण सेना, वैदेशिक कार्यों, वित्त प्रबंधन,

वित्तीय तथा आर्थिक नीतियों पर हो सके और भारत में ब्रिटिश सरकार के वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष

न्यायाधिकरण द्वारा जांच-पड़ताल हो सके और भारत अथवा इंग्लैंड द्वारा लिए जाने वाले दायित्वों की

पड़ताल और उनका आकलन हो सके और दोनों पक्षों को अधिकार मिले के वे इच्छानुसार भागीदारी

को समाप्त कर सकें, लेकिन फिर भी कांग्रेस के प्रतिनिधि-मंडल को छूट होगी कि वह ऐसे समंजन

स्वीकार ले, जो भारत के हित में प्रत्यक्षतः आवश्यक हो।