220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बीड़ा उठाया है। एक समय था जब कांग्रेस ने हर वार्षिक अधिवेशन में सामाजिक सम्मेलन को अपने कार्यक्रम का अंग बनाया था। स्वर्गीय रानाडे ने तो अपनी अनेक गतिविधियों में उसे स्थान दिया था और उसके लिए अपना तन, मन, धन अर्पित किया था। उनकी अध्यक्षता में सामाजिक सम्मेलन के कार्यक्रम में आपने देखा होगा कि अस्पृश्य संबंधी सुधार को प्रमुख स्थान मिला। लेकिन 1920 में कांग्रेस ने एक बड़ा कदम उठाया। राजनीतिक मंच पर घोषणा-पत्र के रूप में अस्पृश्यता-निवारण के मसले को स्थान दिया गया और उसे राजनीतिक कार्यक्रम का खास मुद्दा बनाया गया। जिस प्रकार कांग्रेस का विचार है कि हिंदू-मुसलमान एकता का अर्थ है कि उसमें सभी वर्गों के बीच एकता आएगी और वह स्वराज-प्राप्ति के लिए अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार कांग्रेस का विचार है कि अस्पृश्यता के अभिशाप का निवारण पूर्ण स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए अनिवार्य शर्त है।
गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यकों संबंधी उप-समिति में श्री गांधी ने दूसरे तर्क का सहारा लिया। उन्होंने कहाः
मैं दूसरे अल्पसंख्यकों की मांगों की बात को समझ सकता हूं, लेकिन अस्पृश्यों की ओर से उठाई गई मांग मेरी दृष्टि में ‘सर्वाधिक निर्मम विभाजन’ है। इसका अर्थ है सनातन जारजता की घोषणा। मैं भारत की स्वीधीनता-प्राप्ति के मूल्य पर भी अस्पृश्यों के बुनियादी हितों को नहीं बेचूंगा। मैं दावा करता हूं कि मैं स्वयं अस्पृश्यों के विशाल जनसमूह का प्रतिनिधि हूं। यहां मैं केवल कांग्रेस का पक्ष प्रस्तुत करता हूं, बल्कि मैं स्वयं अपना पक्ष प्रस्तुत करता हूं। मेरा दावा है कि यदि अस्पृश्यों का कोई जनमत-संग्रह होगा, तो वे अपना मत मुझे ही देंगे और मतदान में मुझे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे। मैं भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक जाऊंगा और अस्पृश्यों को बताऊंगा कि पृथक निर्वाचक-मंडल और पृथक आरक्षण इस जारजता को मिटाने का मार्ग नहीं है। यह ग्लानि उनकी नहीं, अपितु रूढि़वादी हिंदू धर्म की है। यह कमेटी और समूचा संसार जान ले कि आज हिंदू सुधारकों की एक ऐसी संस्था है, जिसने अस्पृश्यता के इस कलंक को मिटाने की शपथ ली है। हम नहीं चाहते कि हमारे रजिस्टर और हमारी जनगणना में अस्पृश्यों को पृथक वर्ग के रूप में दर्ज किया जाए। सिख, मुसलमान और यूरोपीय चाहें तो सदा-सर्वदा के लिए अलग वर्ग के रूप में रह सकते हैं। क्या अस्पृश्य सदा-सर्वदा अस्पृश्य रहेंगे? अस्पृश्यता जीवति रहे, इससे तो कहीं अधिक मैं यह चाहूंगा कि हिंदू धर्म समाप्त हो जाए। अतः मैं पूरा सम्मान देता हूं डॉ. अम्बेडकर को, उनकी इस कामना को कि वह अस्पृश्यों का उत्थान चाहते हैं। मैं उनकी योग्यता को पूरा सम्मान देता हूं, पर पूर्ण विनम्रता से मैं यह कहना ही चाहूंगा कि एक महान अन्याय की चक्की में वह पिसे हैं और संभवतः जो कटु अनुभव उन्हें हुए हैं, उनके कारण फिलहाल