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अस्पृश्यों को चेतावनी 317

हो सकती है कि किस प्रकार शक्ति के उपयोग को नैतिकता के अनुकूल बनाया जाए, लेकिन यह निर्विवाद है कि यदि एक पक्ष के पास शक्ति न हो तो दूसरे पक्ष की शक्ति को नष्ट नहीं किया जा सकता। शक्ति या तो आर्थिक होती है या फिर राजनीतिक। सैन्य-शक्ति आज के युग में शक्ति नहीं मानी जाती, क्योंकि वह बंधनमुक्त शक्ति नहीं है। श्रमिक वर्ग की आर्थिक शक्ति हड़ताल में निहित होती है। श्रमिक वर्ग के अंग के रूप में अस्पृश्यों के पास और कोई आर्थिक शक्ति नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में यह शक्ति श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। उसे विधान द्वारा कुंठित किया जाता है और निषेधाज्ञा, पंच-फैसले, मार्शल-ला और सैन्य-बल प्रयोग के शिकंजे में कसा जाता है। अस्पृश्यों की प्रहार (हड़ताल) करने की शक्ति बहुत ही अपर्याप्त है।

अतः इस बात की पूर्ण आवश्यकता है कि अस्पृश्य यथासंभव अधिक-से-अधिक राजनीतिक शक्ति प्राप्त करें। सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से उनकी शक्ति की निरंतर ह्रासमान अपर्याप्तता को देखते हुए वे कदापि अत्यधिक राजनीतिक शक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। जो भी राजनीतिक शक्ति वे प्राप्त करेंगे, वह हिंदुओं की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति के विशाल भंडार को देखते हुए सदा ही अति अल्प होगी।

अस्पृश्य को सदैव स्मरण रखना होगा कि उसकी राजनीतिक शक्ति, भले ही कितनी विशाल हो, किसी काम की नहीं होगी, यदि विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व के लिए वह हिंदुओं का मुंह ताकेगी। हिंदुओं के राजनीतिक जीवन के आधार तो ऐसे आर्थिक तथा सामाजिक हित हैं, जो अस्पृश्यों के हितों के सर्वथा प्रतिकूल हैं।