12. अस्पृश्यों को चेतावनी - Page 331

316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कुर्बान कर दें। इसके विपरीत उनका सतत् प्रयास रहता है कि वे अपने वर्ग हितों पर सामान्य हितों का ठप्पा लगा सकें और यह धारणा उत्पन्न कर सकें कि उनके विशेषाधिकार तो उनके लिए ऐसे न्यायोचित प्रतिदान हैं, जो समाज विशेष उपयोगी तथा उल्लेखनीय कारनामों के लिए पुरस्कार के रूप में देता है। अस्पृश्यों के लिए उनकी संगत शोचनीय रही है। हिंदुओं के साथ उनके टकराव के दौरान उन्हें ऐसी ही अनुभूति हुई है।

अस्पृश्यों के लिए यह आशा भी व्यर्थ की आशा है कि हिंदू सर्वहारा उनका मददगार होगा। भारतीय कम्युनिस्टों की यह अपील कि अस्पृश्य लोग हिंदू सर्वहारा के साथ एकजुट हो जाएं, निश्चय ही इस धारणा पर आधारित है कि सर्वहारा अपने लिए वैसे लाभ प्राप्त नहीं करना चाहता, जिन्हें वह दूसरों के साथ न बांट सकें। लेकिन क्या यह सच है? यूरोप में भी सर्वहारा समरुप वर्ग नहीं है। वहां भी उच्च वर्ग और निम्न वर्ग का भेदभाव है। यह भाव सामाजिक परिवर्तन के प्रति उनके दृष्टिकोण में नजर आता है। उनके अनुसार सुधारवादी ऊंचे वर्ग के होते हैं और क्रांतिकारी नीचे वर्ग के। अतः यह धारणा सच नहीं है। जहां तक भारत का संबंध है, यह निश्चय ही असत्य है। साझे मोर्चे के लिए अति अल्प गुंजाइश है। सामाजिक स्तर पर निश्चय ही उनके बीच मनमुटाव होगा। आर्थिक सतर पर भी गठबंधन के लिए अधिक गुंजाइश नहीं हो सकती।

अनिवार्यतः अस्पृश्यों को क्या प्रयास करना चाहिए? दो बातों के लिए उन्हें प्रयास करना ही होगा, और वे हैं शिक्षा और ज्ञान का प्रसार। विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की शक्ति उस झूठ की बैसाखी पर टिकी रहती है, जिसका प्रचार-प्रसार वे बड़ी लगन व जतन से करते हैं। जब तक शक्ति को मान्यता प्रदान करने वाले झूठ को सच स्वीकार कर लिया जाएगा, तब तक शक्ति का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता। जब तक बचाव के सर्वोपरि तथा प्रमुख कवच झूठ का भांडा नहीं फोड़ा जाएगा, तब तक कोई विद्रोह हो ही नहीं सकता। इससे पूर्व कि किसी अन्याय, किसी कुरीति या दमन का प्रतिरोध किया जा सके, यह अति आवश्यक है कि उसके मूलाधार झूठ को बेनकाब करके उसे भलीभांति पहचान लिया जाए। यह केवल शिक्षा के द्वारा ही हो सकता है।

दूसरे, उन्हें शक्ति के लिए प्रयास करना ही होगा। इसे याद रखना ही होगा कि हिंदुओं और अस्पृश्यों के हितों के बीच वास्तव में टकराव है, और भले ही बुद्धि टकराव का शमन कर सके, पर वह कभी भी ऐसे टकराव की आवश्यकता को अनावश्यक नहीं बना सकती। शक्ति ही एक हित को दूसरे हित से प्रबल बनाती है। ऐसी दशा में शक्ति को नष्ट करने के लिए शक्ति चाहिए। यह समस्या उत्पन्न