13
हिंदुओं से अलगाव
अपनी समस्या के प्रति जागरूक अधिसंख्य अस्पृश्यों का विचार है कि उनके पास अस्पृश्यों की समस्या को हल करने का एक उपाय यह है कि वे हिंदू धर्म को तिलांजलि दे दें और किसी अन्य धर्म को ग्रहण कर लें। 31 मई, 1936 को बंबई में महारों का जो सम्मेलन हुआ था, उसमें सर्व-सम्मति से इस आशय का संकल्प पारित किया गया था। हालांकि सम्मेलन केवल महारों का सम्मेलन ख्1, था, फिर भी संकल्प को भारत-भर के अस्पृश्यों के एक अति विशाल समुदाय का समर्थन प्राप्त था। किसी भी संकल्प ने इतनी हलचल पैदा नहीं की थी। हिंदू जाति की जड़ें ही हिल गई थीं। इस आंदोलन के कर्णधार अस्पृश्यों को गालियां दी गईं, उन्हें कोसा गया और धमकियां दी गईं।
अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन का विरोध करने वालों ने चार प्रमुख आपत्तियां की हैंः
(1) धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को लाभ हो सकता है? धर्म-परिवर्तन से
अस्पृश्यों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।
(2) सभी धर्म सच्चे हैं, सभी धर्म अच्छे हैं। धर्म-परिवर्तन निरर्थक है।
(3) अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन पर राजनीति का रंग चढ़ा हुआ है।
(4) अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन में खोट है, क्योंकि उसके मूल में आस्था नहीं
है।
यह सिद्ध करने के लिए अधिक तर्क की जरूरत नहीं है कि आपत्तियां बचकाना और बेसिरपैर की हैं।
सबसे पहले अंतिम आपतित पर विचार करें। इतिहास में ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है, जहां किसी धार्मिक ध्येय के बिना धर्मांतरण हुआ है। क्लोविस और उसकी प्रजा
- सम्मेलन केवल महारों का था, क्योंकि मंशा यह थी कि समुदायवार भावना की तीव्रता को परखा जाए
और हर समुदाय की आवाज को ग्रहण किया जाए।