हिंदुओं से अलगाव 341
जड़ तक पहुंचने से नहीं चूकेगा और अस्पृश्य को स्वयं यह स्वीकार करने के लिए विवश कर देगा कि वह एक अस्पृश्य है।
नाम का महत्व ही नहीं, भारी महत्व है, क्योंकि नाम अस्पृश्यों की स्थिति में क्रांति ला सकता है। लेकिन निश्चय ही नाम ऐसा हो, जो हिंदू धर्म से बाहर के समुदाय का नाम हो। वह ऐसा हो कि हिंदू धर्म उसे विकृत और अवनत न कर सके। ऐसा नाम अस्पृश्यों की संपत्ति केवल तभी हो सकता है, जब वे धम-परिवर्तन कर लें। हिंदू धर्म के भीतर नाम बदलकर धर्म-परिवर्तन गुप्त धर्म-परिवर्तन होगा और वह किसी काम का नहीं हो सकता।
धर्म-परिवर्तन संबधी यह चर्चा कुछ निरर्थक प्रतीत हो सकती है। वह निरर्थक होगी भी। वह तब तक सार्थक नहीं हो सकती, जब तक यह मालूम न हो जाए कि अस्पृश्य किस धर्म को स्वीकार करना चाहते हैं। क्योंकि धर्म-परिवर्तन से कौन-सा विशेष लाभ प्राप्त होगा, वह चुने गए धर्म और उस धर्म के अनुयायियों की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करेगा। हो सकता है कि एक धर्म उन्हें धर्म-परिवर्तन के तीनों के तीनों लाभ दे दे, दूसरा केवल दो ही लाभ दे और तीसरा केवल एक ही लाभ दे। अस्पृश्य किस धर्म को चुनें, यह इस अध्याय की विषय-वस्तु नहीं है। इस अध्याय की विषय-वस्तु है कि क्या धर्म-परिवर्तन अस्पृश्यता की समस्या को हल कर सकता है। निश्चय ही इसका उत्तर है, ‘कर सकता है।’
निश्चय ही हमारे तक का बल धर्म के उस दृष्टिकोण पर निभर्र करता है, जो सामान्य दृष्टिकोण से कुछ भिन्न है। सामान्य दृष्टिकोण के अनुसार धर्म का सरोकार नारायण से नर के संबंध से है और उसका केवल इतना ही अर्थ है। हमारे दृष्टिकोण के अनुसार धर्म का प्रयोजन आत्माओं का त्राण नहीं है, अपितु उसका प्रयोजन तो है समाज की रक्षा और व्यक्ति का कल्याण। जो लोग धर्म के सामान्य दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं, केवल उनके लिए ही यह समझ पाना कठिन है कि किस प्रकार धर्म-परिवर्तन अस्पृश्यों की समस्या को हल कर सकता है। जो लोग इस अध्याय में वर्णित धर्म-संबंधी दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं, उन्हें हमारे निष्कर्ष की सार्थकता को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।