13. हिंदुओं से अलगाव - Page 355

340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘अस्पृश्य’ नाम बुरा नाम है। वह घृणा पैदा करता है। वह अप्रिय है और उससे दुर्गन्ध आती है। ‘अस्पृश्य’ नाम ही अस्पृश्य के प्रति हिंदू के सामाजिक रवैए का निर्धारण करता है। एक नपातुला रवैया ‘अस्पृश्यों’ के प्रति है। उसकी नापतोल उस दुर्गन्ध से की जाती है, जो ‘अस्पृश्य’ नाम के भीतर भरी है। लोग हर अस्पृश्य के व्यक्तिगत गुणों की परख करना ही नहीं चाहते, भले ही वह कितना भी गुणी क्यों न हो। सभी अस्पृश्य यह अनुभव करते हैं। आम तौर पर कोशिश यही होती है कि वे स्वयं को ‘अस्पृश्य’ के अलावा किसी अन्य नाम से पुकारें। चमार अपने आप को रविदास अथवा जाटव कहते हैं। डोम अपने आपको शिल्पकार कहते हैं। पेरिया स्वयं को आदि-द्रविड़ कहते हैं। मदिगा स्वयं को अरुन्धात्य कहते हैं। महार स्वयं को चोखामेला अथवा सोमवंशी कहते हैं। भंगी स्वयं को बाल्मीकि कहते हैं। अपनी बस्तियों से बाहर वे सभी स्वयं को ईसाई कहेंगे।

अस्पृश्य जानते हैं कि यदि वे स्वयं को अस्पृश्य कहेंगे तो हिंदू एकदम उबल पड़ेगा और उन पर अपने क्रोध और द्वेष की वर्षा कर देगा। यही कारण है कि वे स्वयं ऐसे नाम रखते हैं, जो रक्षा के लिए रंग बदलने की प्रक्रिया के अनुकूल हों।

प्रायः ऐसा होता है कि रंग बदलने का यह प्रयास अपने प्रयोजन में पूर्णतः विफल हो जाता है, क्योंकि हिंदुओं की दृष्टि में हिंदू होना कोई अंतिम सामाजिक श्रेणी नहीं है। अंतिम सामाजिक श्रेणी है, जाति अथवा उप-जाति, यदि कोई उप-जाति है। जब हिंदू आपस में मिलते हैं तो निश्चय ही वे पूछते हैं, ‘आपका परिचय’। यदि इस प्रश्न का उत्तर दिया जाए कि ‘मैं हिंदू हूं’ तो वह संतोषजनक उत्तर नहीं होगा। निश्चय ही उसे अंतिम उत्तर के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। निश्चय ही पूछताछ जारी रहेगी। निश्चय ही ‘हिंदू’ उत्तर के बाद प्रश्न किया जाएगा, ‘कौन जात?’। निश्चय ही उसके बाद पूछा जाएगाः ‘कौन उप-जात?’ जब पूछने वाला अंतिम सामाजिक श्रेणी, यानी जाति अथवा उप-जाति पर पहुंच जाएगा, तभी वह पूछताछ बंद करेगा।

जो अस्पृश्य रक्षा के लिए रंग बदल कर नया नाम धारण करता है, उसे पता चलता है कि नए नाम से काम नहीं बनता। ताबड़तोड़ प्रश्नों की बौछार से उसे धराशायी कर दिया जाता है। उसे बताना पड़ता है कि वह अस्पृश्य है। शुरू में ही स्वेच्छा से असलियत बता देने से जितना गुस्सा उस पर उतारा जाता, उससे भी कहीं अधिक कोप का भाजन उसे असलियत छिपाने के बाद बनना पड़ता है।

इस चर्चा से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। एक तो यह कि अस्पृश्यों का घटिया दर्जा एक दुर्गन्ध वाले नाम के साथ जुड़ा हुआ है। जब तक नाम नहीं बदला जाता, तब तक उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरी बात यह है कि हिंदू धर्म के भीतर नाम बदलने से काम नहीं बनेगा। हिंदू ऐसे नाम की