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जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन ख्1,
हिंदू समाज की वर्तमान उथल-पुथल का कारण है, आत्म-परिरक्षण की भावना। एक समय था, जब इस समाज के अभिजात वर्ग को अपने परिरक्षण के बारे में कोई डर नहीं था। उनक तर्क था कि हिंदू समाज एक प्राचीनतम समाज है, उसने अनेक प्रतिकूल शक्तियों के प्रहार को झेला है, अतः हमारी उसकी सभ्यता और संस्कृति में निश्चय ही काई अंतर्निहित शक्ति और दमखम होगा_ तभी तो उसकी हस्ती बनी रही। अतः उनका दृढ़ विश्वास था कि उनके समाज का तो सदा जीवित रहना निश्चित है। लगता है कि हाल की घटनाओं ने उनके इस विश्वास को झकझोर दिया है। हाल ही में समूचे देश में जो हिंदुओं को पीट ही नहीं सकता, बल्कि बुरी तरह पीट सकता है। अतः हिंदुओं का अभिजात वर्ग नए सिरे से इस प्रश्न पर विचार कर रहा है कि अस्तित्व के संघर्ष में क्या इस प्रकार जीवित रहने का कोई मूल्य है। जो गर्वीला हिंदू सदा ही यह राग अलापता रहा है कि उसके जीवित रहने का तथ्य इस बात का प्रमाण है कि वह जीवित रहने में सक्षम है, उसने कभी शांत मन से यह नहीं सोचा कि जीवित रहना कई प्रकार को है और सभी का मूल्य एक जैसा नहीं होता। हम शत्रु के सामने सीना तानकर और उसे जीतकर अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं अथवा हम पीछे हटकर और स्वयं को सुरक्षित स्थान में छिपाकर भी अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में अस्तित्व बना रहेगा। लेकिन निश्चय ही दोनों अस्तित्वों में आकाश-पाताल का अंतर है। महत्व अस्तित्व के तथ्य का नहीं है, बल्कि अस्तित्व के स्तर का है। हिंदू जीवित रह सकते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि वे आजाद लोगों के रूप में जीवित रहेंगे या गुलामों के रूप में। लेकिन मामला इतना निराशाजनक लगता है कि मान भी लें कि वे जैसे-तैसे गुलामों के रूप में जीवित रह सकते हैं, फिर भी यह पूर्णतः निश्चित नहीं दीख पड़ता कि वे हिंदुओं के रूप में जीवित रह सकते हैं, क्योंकि मुसलमानों ने न केवल उन्हें बाहुबल के संघर्ष में
- मूलतः, तेलुगु समाचार स्पेशल नंबर, में प्रकाशित, नवंबर 1926