14. जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन - Page 359

344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मात दी है, बल्कि सांस्कृतिक संघर्ष में भी मात दी है। हाल के दिनों में इस्लामी संस्कृति के प्रसार के लिए मुसलमानों ने एक नियमित और तेज अभियान चलाया है। कहा जाता है कि धर्म-परिवर्तन के अपने आंदोलन द्वारा उन्होंने हिंदू धर्म के लोगों को अपनी ओर करके अपनी संख्या में भारी वृद्धि कर ली है। मुसलमानों का कैसा सौभाग्य! अज्ञात कुल के कोई सात करोड़ लोगों की एक विशाल संख्या है। उन्हें हिंदू कहा तो जाता है, पर उनका हिंदू धर्म से कोई खास घनिष्ठ संबंध नहीं है। हिंदू धर्म ने उनकी स्थिति को इतना असहनीय बना दिया है कि उन्हें सहज ही इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिए फुसलाया जा सकता है। उनमें से कुछ तो इस्लाम में शामिल हो रहे हैं और अन्य अनेक शामिल हो सकते हैं।

हिंदू अभिजात वर्ग के मानस में खलबली मचाने के लिए यह काफी है। यदि हिंदू संख्या में अधिक होने पर भी मुसलमानों का सामना नहीं कर सकते, तो उस समय उनकी क्या दुर्गति होगी, जब उनके अनुयायियों की संख्या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेने के कारण और घट जाएगी। हिंदू अनुभव करने लगे हैं। कि उन्हें अपने लोगों को इतर धर्म में जाने से रोकना होगा। उन्हें अपनी संस्कृति को बचाना होगा। इससे शुद्धि आंदोलन या लोगों को पुनः धर्म में लेने के आंदोलन की उत्पत्ति हुई।

कुछ रूढि़वादी लोग इस आंदोलन का विरोध इस आधार पर करते हैं कि हिंदू धर्म कभी भी धर्म-प्रचार करने वाला धर्म नहीं था और हिंदू को जन्म से ही ऐसा होना चाहिए। इस दृष्टिकोण के पक्ष में कुछ कहा जा सकता है। जहां तक स्मृति या परंपरा पहुंच सकती है, उस काल से आज तक कभी भी धर्म-प्रचार हिंदू धर्म का व्यवहार पक्ष नहीं रहा है। मिशनों के निवेदन-दिवस 3 दिसंबर, 1873 को वेस्टमिन्स्टर एब्बे की ओर से महान जर्मन विद्वान और प्राच्यविद प्रो. मैक्स मूलर ने जो अभिभाषण दिया था, उसमें उन्होंने जोरदार शब्दों में कहा था कि हिन्दू धर्म, धर्म-प्रचार करने वाला धर्म नहीं है। जो रूढि़वादी वर्ग स्वार्थ परायणता में विश्वास नहीं करता, वह अनुभव कर सकता है कि शुद्धि के उनके विरोध का सुदृढ़ आधार है, क्योंकि उस प्रथा का हिंदू धर्म के सर्वोपरि मूल सिद्धांतों से प्रत्यक्ष विरोध है। लेकिन वैसी ही ख्याति वाले अन्य विद्वान हैं, जो शुद्धि आंदोलन के पक्षधरों का समर्थन करते हैं। उनकी राय है कि हिंदू धर्म, धर्म-प्रचार करने वाला धर्म रहा है और वह ऐसा हो सकता है। प्रो. जौली ने अपने लेख ‘डाई औसब्रेटुग उेर इंडिसचेन फुल्टर’ में उन साधानों और उपायों का विशद् वर्णन किया है, जो देश के आदिवासियों के बीच हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए प्राचीन हिंदू राजाओं एवं प्रचारकों ने अपनाए हैं। प्रो. मैक्स मूलर के तर्क का खंडन करने वाले दिवंगत सर अल्फ्रेड लयाल ने भी यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हिंदू धर्म में धर्म का प्रचार किया है। केस की संभाव्यता निश्चय ही