14. जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन - Page 362

जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन 347

बल्कि उनमें एकजुटता का अभाव है। यदि हिंदू समाज की एकजुटता को सशक्त करना है तो हमें उन शक्तियों से निपटना होगा, जिन पर उसके विघटन का दायित्व है। मेरी आशंका है कि हिंदू समाज की एकजुटता के स्थान पर यदि केवल शुद्धि का सहारा लिया गया तो इससे और अधिक विघटन होगा। उसमें मुस्लिम संप्रदाय नाराज हो जाएगा और हिंदुओं को कोई लाभ भी नहीं होगा। शुद्धि के कारण जो ऐसा व्यक्ति आएगा, वह बेघर ही रहेगा। वह अलग-थलग एकाकी जीवन ही बिताएगा और उसकी किसी के प्रति न कोई विशिष्ठ निष्ठा होगी और न ही कोई खास लगाव होगा। यदि शुद्धि के कारण हिंदू शिविर के भीतर श्रद्धानंद की मलकाना जैसी विशाल खेप आ भी जाए तो उससे केवल यही होगा कि वर्तमान संख्या में एक और जाति की वृद्धि हो जाएगी। अब देखिए, जितनी अधिकता जातियों की होगी, हिंदू समाज का उतना ही अधिक अलगाव और विलगाव होगा और वह उतना ही अधिक कमजोर होगा। यदि हिंदू समाज जीवित रहना चाहता है तो उसे सोचना ही पड़ेगा कि वह संख्या में वृद्धि न करे, बल्कि अपनी एकात्मता में वृद्धि करे और उसका अर्थ है, जातिप्रथा का उन्मूलन। जातिप्रथा का उन्मूलन हिंदुओं का सच्चा संघटन है। जब जातिप्रथा के उन्मूलन से संघटन की प्राप्ति हो जाएगी तो शुद्धि की जरूरत ही नहीं रहेगी और यदि शुद्धि की भी गई तो उससे वास्तविक शक्ति प्राप्त होगी। जातिप्रथा के रहते वह संभव नहीं होगा और यदि शुद्धि को अमल में लाया गया तो वह हिंदुओं के वास्तविक संघटन और एकात्मता के लिए हानिकर सिद्ध होगी। लेकिन जैसे-तैस हिंदू समाज का अति क्रांतिकारी तथा प्रबल सुधारक जातिप्रथा के उन्मूलन की अनदेखी करता है। वह धर्मान्तरित हिंदू के पुनः धर्मान्तरण जैसे निरर्थक उपायों की वकालत करता है। वह कहता है कि खानपान में परिवर्तन किया जाए और अखाड़े खोले जाएं। किसी दिन तो हिंदुओं को इस बात का आभास होगा कि वे न तो अपने समाज को बचा सकते हैं और न ही अपनी जातिप्रथा को। आशा की जाती है कि वह दिन अधिक दूर नहीं है।