14. जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन - Page 361

346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

धर्म-परिवर्तन करने वाले के लिए कोई स्थान नहीं होगा, तो न तो धर्म-परिवर्तन के लिए कोई न्योता दिया जा सकता है और न ही उसे स्वीकार किया जा सकता है।

धर्म-परिवर्तन करके हिंदू धर्म ग्रहण करने वाले के लिए हिंदू समाज में क्या कोई स्थान है? अब हिंदू समाज के संगठन में जातिप्रथा की प्रधानता है। प्रत्येक जाति में सजातीय विवाह होते हैं और प्रत्येक दूसरे का विरोध करती है। या यूं कहिए कि वह केवल उसी व्यक्ति को अपना सदस्य बनाती है, जो उसके भीतर पैदा होता है और बाहर के किसी व्यक्ति को अपने भीतर नहीं आने देती। चूंकि हिंदू समाज जातियों का परिसंघ है और प्रत्येक जाति अपने-अपने अहाते में बंद है, अतः उसमें धर्म-परिवर्तन करने वाले के लिए कोई स्थान नहीं है। कोई भी जाति उसे अपनी जाति में शामिल नहीं करेगी। किस कारण हिंद धर्म, धर्म प्रचारक धर्म नहीं रहा, इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में खोजा जा सकता है कि उसने जातिप्रथा का विकास किया। जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन परस्पर विरोधी हैं। जब तक सामूहिक धर्म-परिवर्तन संभव था, तब तक हिंदू समाज धर्म-परिवर्तन कर सकता था, क्योंकि धर्म-परिवर्तन करने वाले इतनी अधिक संख्या में होते थे कि वे एक ऐसी नई जाति का गठन कर सकें जो स्वयं उनके बीच में से सामाजिक जीवन के तत्व प्रदान कर सकें। लेकिन जब सामूहिक धर्म-परिवर्तन की गुंजाइश न रही और केवल व्यक्ति का धर्म-परिवर्तन किया जा सका तो अनिवार्य था कि हिंदू धर्म, धर्म प्रचारक धर्म नहीं रहा, क्योंकि उसका सामाजिक संगठन धर्म-परिवर्तन करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं बना सका।

किस कारण हिंदू धर्म, धर्म प्रचारक धर्म नहीं रहा, इस प्रश्न की व्याख्या मैंने इसलिए नहीं की है कि एक नई व्याख्या देकर विचार की मौलिकता का श्रेय प्राप्त कर सकूं। मैंने प्रश्न की व्याख्या करके उसका उत्तर दिया है, क्योंकि मैं अनुभव करता हूं कि दोनों का शुद्धि आंदोलन से अति महत्वपूर्ण संबंध है। चूंकि इस आंदोलन के पक्षधरों के प्रति मेरी गहरी सहानुभूति है, अतः मैं कहना ही चाहूंगा कि उन्होंने अपने आंदोलन की सफलता के मार्ग की बाधाओं का विश्लेषण नहीं किया है। शुद्धि आंदोलन का उद्देश्य है कि हिंदू समाज की संख्या में वृद्धि करे। कोई समाज इसलिए सशक्त नहीं होता कि उसकी संख्या अधिक है, बल्कि इसलिए होता है कि उसका गठन ठोस होता है। ऐसी मिसालों की कमी नहीं है, जहां धर्मोन्मत्तों के एक संगठित सशक्त दल ने असंगठित धर्मयोद्धाओं की एक बड़ी सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया है। हिंदू-मुस्लिम दंगों में भी यह सिद्ध हो चुका है कि हिंदुओं की वहीं पिटाई नहीं होती, जहां उनकी संख्या कम है, अपितु उस स्थान पर भी मुस्लिम उन्हें पीट देते हैं, जहां उनकी संख्या अधिक होती है। मोपलाओं का मामला संगत है। केवल उसी से पता चल जाना चाहिए कि हिंदुओं की कमजोरी उनकी संख्या में कमी नहीं है,