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सभ्यता या घोर असभ्यता

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पर चलने का साहस नहीं करते।’

इन अभागी आत्माओं की यह कैसी अधोगति एवं दुर्गति है कि उन्हें इस हिंदू सभ्यता ने सामाजिक कुष्ठी बना दिया है। उन्हें अस्पृश्य कहा जाता है। क्या यह स्वयं में कम दुर्भाग्यपूर्ण है? लेकिन यह अपेक्षा करना कि अस्पृश्य स्वयं अपने ही मुख से अपनी लज्जा का ढोल पीटे कि वह अस्पृश्य है, ऐसी क्रूरता है, जो मेरी राय में तो बेमिसाल है। इस हिंदू सभ्यता के बारे में अस्पृश्य क्या कहेगा। क्या यह गलत होगा, यदि वह कहे कि यह सभ्यता नहीं, यह तो घोर असभ्यता है?

इस बारे में तो किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है कि आदिम जातियों, जरायम-पेशा जातियों और अस्पृश्य वर्गों की जो दशा है, वह हिंदू सभ्यता के मूल सिद्धांतों का ही कुफल है।

इन आदिम जातियों को हिंदुओं की परिधि में लाने के लिए कोई आंदोलन क्यों नहीं चलाए गए हैं?

कतिपय जनजातियों ने जुर्म को अपना पेशा क्यों बना लिया है? अस्पृश्यों जैसे कतिपय वर्गों को मानव-संसर्ग के अयोग्य क्यों ठहराया गया है?

इन प्रश्नों में से हरेक का उत्तर हिंदू सभ्यता के किसी-न-किसी मूल सिद्धांत से जुड़ा है।

प्रथम प्रश्न का उत्तर है कि वर्ण-व्यवस्था हिंदू धर्म को सेवाव्रती (मिशनरी) धर्म बनने से रोकती है और वर्ण (जाति) हिंदू सभ्यता का मूल अंग है। दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि चातुर्वर्ण्य उन अवसरों पर अंकुश लगाता है, जो व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्राप्त कर सकता है। समूचे ज्ञान और ज्ञानार्जन पर ब्राह्मणों का एवं सभी सामरिक सेवाओं पर क्षत्रियों का एकाधिकार है। व्यापार केवल वैश्य ही कर सकते हैं। शूद्रों के भाग्य में है, केवल दास-कर्म। जो इस वर्ण-व्यवस्था से बाहर है, उनके लिए कुछ भी सम्मानजनक कर्म शेष नहीं रहा है। अतः उन्हें विवश होकर अपना पेट भरने के लिए जुर्म का धंधा और अपमानजनक तरीके अपनाने पड़े हैं। यह है चातुर्वर्ण्य का दुष्परिणाम और चातुर्वर्ण्य हिंदू सभ्यता का मूलाधार है।

तीसरे प्रश्न का उत्तर है कि अस्पृश्यता ‘स्मृतियों’ में वर्णित हिंदू कानून का अंग है और ‘स्मृतियां’ हिंदू सभ्यता की मूलाधार हैं।

IV

यह सच है कि जहां तक अतीत का संबंध है, भारत के सात करोड़ 95 लाख लोगों की इन तीनों श्रेणियों के लिए अधोगति की दशा एक-सी रही है। लेकिन