1. सभ्यता या घोर असभ्यता - Page 37

22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सनसनी पैदा कर दी है। शिकायत करने वालों को समुचित कानूनी मदद देने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन अस्पृश्यता के बारे में इस हिंदू सभ्यता के नियम इतने सूक्ष्म हैं कि वे इस बात की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते कि अस्पृश्य लोग अस्पृश्य होने का दिखावा कर सकें। अतः कतिपय इलाकों में ऐसे नियम हैं, जिनके अनुसार अस्पृश्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे काला धागा पहनें, ताकि उन्हें सरलता से पहचाना जा सके और बोलकर घोषणा करें कि वे अस्पृश्य हैं, ताकि स्पृश्य अनजाने में उन्हें स्पर्श करके भ्रष्ट न होने पाएं। बंबई प्रेसिडेंसी में द्वारिका नगर में महान हिंदू देवता कृष्ण का विख्यात मंदिर है। वहां का नियम है कि सड़कों पर चलते समय हर अस्पृश्य को अपने हाथों से ताली बजानी होगी और कहना होगा, ‘बचो, बचो’ ताकि इस बात की घोषणा हो सके कि वह अस्पृश्य है और स्पृश्य सावधार हो जाएं। मद्रास प्रेसिडेंसी के चेरुमानों के बारे में निम्न विवरण उपलब्ध हैः

इन दयनीय प्राणियों की सामाजिक स्थिति बहुत घटिया है। जब कोई चेरुमान

उच्च जाति के किसी व्यक्ति से मिले तो उसे 30 फुट की दूरी पर ही खड़ा

रहना होगा। यदि वह इस निषिद्ध दूरी के भीतर आ जाता है तो उसके सामीप्य

से भ्रष्टता होगी और वह जल से स्नान करने पर ही दूर होगी। चेरुमान, ब्राह्मणों

के किसी गांव, मंदिर या पोखरे पर नहीं जा सकता। यदि वह जाता है तो शुद्धि

जरूरी हो जाती है। आम सड़क पर चलते समय भी यदि वह अपने स्वामी को

देख लेता है तो उसे आम रास्ता छोड़ना होगा और भले ही कीचड़ हो, उस पर

चलना होगा, ताकि वह अकस्मात अपवित्र करने के लिए स्वामी के कोप से

बच सके। राहगीर अपवित्र न हो जाए, इसके लिए वह इस अप्रिय ध्वनि को

दोहराता है - ‘ओ, ओह, ओ’। कुछ स्थानों में, जैसे पालघाट में, हम देख सकते

हैं कि चेरुमान सड़क के किनारे गंदा कपड़ा फैलाकर तीखी आवाज में चिल्लाता

है, ‘मुझे कुछ पैसे दो और उन्हें कपड़े पर फेंक दो।’ कोचीन और ट्रावनकोर

के देशी राज्यों मेंउनकी स्थिति असहनीय है। वहां ब्राह्मण का प्रभाव प्रबल है

और पालघाट तालुक में तो आज भी चेरुमान बाजार में कदम नहीं रख सकता।

मलाबार में कहा जाता है, ख्1, ‘उच्च जाति का व्यक्ति चलते-चलते कभी-कभी

जोर से चिल्लाता है, ताकि निम्न जाति का व्यक्ति सड़क से हट जाए और उसे

अपवित्र न कर पाए। जब निम्नतम जातियों के लोग चलते हैं तो वे चिल्लाते हैं,

ताकि अपवित्रता की छाप वाली अपनी उपस्थिति का भान करा सकें और उच्च

जाति के व्यक्ति के आदेश को सुनकर सड़क से हट जाएं। आम तौर पर देखा

जा सकता है कि छोटी जाति के लोग सड़क के समानांतर चलते हैं और उस

  1. थर्स्टन, ट्राइब्स एंड कास्ट्स आफ सदर्न इंडिया, खंड 5, पृ. 196