15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 386

अस्पृश्यों का ईसाईकरण 371

‘मनुष्य सोचता है, यह जीव-विज्ञान का विषय है। लेकिन जो वह सोचता है, वह समाज-विज्ञान का विषय है।’ प्रारंभिक ईसाई मिशनरियों ने इस अति गहन विचार की पूर्ण अवहेलना की। हर प्रकार का विचार हर व्यक्ति को मान्य नहीं होता। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि पूंजीवाद धनवानों को रास आता है, निर्धनों को नहीं। इसके विपरीत समाजवाद निर्धनों को रास आता है, धनवानों को नहीं। इसका कारण यह है कि व्यक्ति के हितों तथा उसके हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले विचारों के बीच बड़ा गहरा नाता होता है। हित के प्रतिकूल विचारों को वह अपने मन में स्थान नहीं देगा। मानव-मनोवृत्ति के इस विश्लेषण के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्राह्मण तथा उच्च वर्ग ईसाई सिद्धांत को कभी ग्रहण कर ही नहीं सकते। ईसाई सिद्धांत मानव को भाईचारा सिखाता है और उसके अनुसार सब व्यक्तियों का एक-सा दर्जा है। अब ब्राह्मण तथा उच्च वर्गों का हित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को बनाए रखने में है। यह व्यवस्था असमानता पर टिकी है। औरों की तुलना में वह उन्हें ऊंचा दर्जा और दूसरों पर धोंस जमाने और उनका शोषण करने का अवसर प्रदान करती है। ईसाई धर्म को स्वीकार करने की अपेक्षा उनसे कैसे की जा सकती है? उसका अर्थ होगा, उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा का समर्पण। उनके पीछे लगना एक थोथा प्रयास रहा है और यदि प्रयास चलता रहता, तो मुझे पूरा यकीन है कि भारत में कोई ईसाई होता ही नहीं। आज भारत में जितने ईसाइयों को हम देख रहे हैं, उसका कारण यह है कि कुछ ईसाई मिशनरियों ने इस प्रयास की निरर्थकता को भांप लिया था। यदि उन्होंने इस भूल को भांपा न होता और निम्न वर्गों के दिल को जीतने का प्रयास प्रारंभ न किया होता, तो भारत में एक भी ईसाई न मिलता। आज भी सैंकड़ों और हजारों सवर्ण हिंदू, ईसाई स्कूलों, कालिजों और अस्पतालों का लाभ उठाने हैं। लाभ प्राप्त करने वाले इन लोगों में से कितने ईसाई बनते हैं? उनमें से हरेक लाभ उठाता है, पर उनमें से कभी कोई भी यह सोचने का कष्ट नहीं उठाता कि मानव की इतनी सेवा करने वाला धर्म कितना गुणी होगा।

  1. साइकोलाजी, खंड 1