370 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आंतरिक पवित्रता लुप्त हो चुकी थी। डाओक्लेश्यिन के राज्य-काल में राजमहल,
न्यायालयों तथा सेना में छिपे तौर से भारी संख्या में ईसाई मौजूद थे, जो वर्तमान
हितों का समन्वय भविष्य के हितों से करने का जुगाड़ कर रहे थे।
फिर भी ये आपत्तियां या तो इतनी कम है या इतने आधुनिक-काल की हैं
कि उनके द्वारा अज्ञानता और गुमनामी के उस लांछन को पूर्णतया मिटाया नहीं जा
सकता, जो बड़े अहंकार के साथ ईसाई धर्म में सबसे पहले दीक्षितों पर लगाया
गया है। बजाए इसके कि हम अपने समर्थन में बाद के काल की कल्पनाओं का
सहारा लें, समझदारी इसी में होगी कि हम अपयश के इस अवसर को प्रशंसा
का अवसर बना दें। गंभीर चिंतन से हमें बोध होगा कि प्रभु ने धर्मदूतों को भी
गेलिली के मछेरों में से चुना था। आदि ईसाइयों की लौकिक अवस्था की जितनी
कम निंदा हम करेंगे, उतना ही अधिक औचित्य हमें उनकी योग्यता और सफलता
की प्रशंसा करने के लिए दीख पड़ेगा। हमारे लिए अनिवार्य है कि सदा हम यह
स्मरण रखें कि स्वर्ग के राज्य का वचन निर्धनों को सच्ची भावना से दिया गया
है और आपदा तथा मानव-जाति की घृणा से त्रस्त मानस भावी सुख के दैवी
वचन को बड़े उत्साह के साथ सुनते हैं, जब कि इसके विपरीत धनवान लोग
इस लोग के परिग्रह से संतुष्ट रहते हैं और बुद्धिमान लोग संशय और विवाद में
फंस कर बुद्धि और ज्ञान की अपनी थोथी श्रेष्ठता का दुरुपयोग करते हैं।
इसी प्रकार हैलम ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ मिडिल ऐजेज’ में उस वर्ग ही चर्चा की है, जहां से आदि ईसाई आए थे।
किस कारण ईसाई धर्म रोम के सभी नागरिकों का, यानी उच्च वर्ग का भी बन गया? उसके दो बाह्य कारण थे। पहला कारण तो यह था कि ईसाई धर्म को राज्य-धर्म बना दिया गया। उसका अर्थ था कि हर अन्य धर्म पर पाबंदी लगा दी गई। दूसरा करण यह था कि ईसाई धर्म को अंगीकार कर लेने के बाद रोमन सम्राटों ने विरासत के कानून में परिवर्तन कर दिया। उसके अनुसार पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार उस संतान को नहीं रहा, जो गैर-ईसाई रहा हो।
इससे केवल यही पता चलता है कि ईसाई धर्म की अपील सहज रूप से निर्धन वर्गों को रास आई। इन्हीं के बीच पहले-पहल ईसाई धर्म का प्रसार हुआ। उसमें कानून या किसी अन्य बाह्य लाभ का कोई हाथ नहीं था।
भारत के प्रारंभिक ईसाई मिशनरियों ने शुरूआत ही इस प्रकार की कि इस सहज क्रम को उलट दिया। मैं इसे सजह कहता हूं, क्योंकि यह मानवीय मनोविज्ञान के सांचे में सही बैठता है। मनोविज्ञान के महान पंडित प्रो. थार्नडाइक ख्1, कहते हैंः