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धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
I. गांधी और ईसाई धर्म के प्रति उनका प्रतिरोध,
II. ईसाई धर्म और समाज-सेवा,
III. ईसाई धर्म और गैर-ईसाई धर्म,
IV. ईसाई धर्म और धर्म-परिवर्तन करने वालों की भावना,
और
V. ईसाई संप्रदाय और उसकी सामाजिक स्थिति।
I
सन् 1928 में इंटरनेशनल फेलोशिप की बैठक हुई। इस संस्था का उद्देश्य है कि विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच भाईचारे की भावना बढ़ाई जाए। इस बैठक में जहां ईसाई मिशनरियों ने भाग लिया, वहां हिंदुओं और मुसलमानों ने भी भाग लिया। श्री गांधी भी मौजूद थे। बैठक में यह सवाल उठाया गया कि यह भाईचारा अपने आदर्श की कसौटी पर कहां तक खरा उतर सकता है, यदि आदर्श का पालन करने वाले लोग दूसरों का धर्म बदल कर उन्हें अपने धर्म में शामिल करना चाहें। बहस में श्री गांधी ने भी भाग लिया। उनके दोस्त श्री सी.एफ. एंड्रयूज ने चर्चा के बारे में इस प्रकार लिखा है ख्1, ः
इस सवाल के पीछे भारत में ईसाई मिशनरी की स्थिति को निश्चित चुनौती
थी। उदारमना मिशनरी फेलोशिप में अति आनंद का अनुभव कर रहे थे।... फिर
महात्मा गांधी ने घोषणा की। उन्होंने कहा कि ऐसा करते समय या फेलोशिप
का सदस्य बनते समय यदि मन के किसी कोने में तनिक भी यह कामना या
विचार हो कि फेलोशिप के किसी अन्य सदस्य पर प्रभाव डाला जाए या उसका
- दि यंग मेन ऑफ इंडिया, बर्मा एंड सीलोन, में ‘दि बेसिस आफ इंटर-रिलीजियस फलोशिप में सी.एफ.
एंड्रयूज ने लिखा है, देखिए, खंड 11, सं. 6 जून 1928