16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 389

374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

धर्म-परिवर्तन किया जाए, तो आंदोलन की भावना मिट्टी में मिल सकती है।

यदि किसी के मन में ऐसी कामना हो, तो उसे फेलोशिप से अलग हो जाना

चाहिए।

ईसाई मिशनरियों ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जब पूछा, ‘यदि उनके पास दुनिया का सबसे बड़ा खजाना हो तो क्या उसे बांटने की कामना भी गलत होगी’, तो श्री गांधी ने तुरंत उसका दो-टूक जवाब दे दिया। श्री एंड्रयूज कहते हैं, ‘गांधीजी अडिग रहे।’ उन्होंने दृढ़ता से कहा, ‘ऐसा कामना का विचार भी गलत है और मैं इस दृष्टिकोण पर अडिग रहूंगा।’

ईसाइयों द्वारा धर्म-परिवर्तन के प्रति श्री गांधी का विरोध अब तो जग को जाहिर हो गया है। 1936 के बाद से तो वह मिशनरियों के हर प्रकार के प्रचार के कट्टर विरोधी हो गए हैं। उनकी खास आपत्ति यह है कि मिशनरी ईसाई धर्म का प्रचार अस्पृश्यों के बीच कर रहे हैं। ईसाई मिशनों तथा ईसाई धर्म में अस्पृश्यों को शामिल किए जाने का उनका विरोध कतिपय प्रस्थापनाओं पर आधारित है। उनका प्रतिपादन उन्होंने बड़े ही बेबाक शब्दों में किया है। मेरे विचार में सार रूप में उनके दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने के लिए निम्न चार प्रस्थापनाएं पर्याप्त होंगी। वह कहते हैंः

I. मेरा दृष्टिकोण है कि सभी धर्म मूलतः समान हैं। सभी धर्मों के प्रति

हमारी सहज श्रद्धा अपने धर्म जैसी ही होनी चाहिए। ध्यान रहे, आपसी

सहिष्णुता नहीं, अपितु बराबर की श्रद्धा। ख्1,

II. (मिशनरियों से) मैं बास केवल यही अपेक्षा करता हूं कि वे सच्चे ईसाईयों

जैसा जीवन जिएं, न कि उसकी टीका करें। ख्2, आपका जीवन हमें संदेश

दे। अंधे लोग गुलाब को तो नहीं देख पाते, पर उसकी गंध को अनुभव

करते हैं। गुलाब के सिद्धांत का यही रहस्य है, लेकिन यीशु का सिद्धांत

तो गुलाब के सिद्धांत से भी अधिक सूक्ष्म और सुगंधमय है। यदि गुलाब

के लिए किसी एजेंट की जरूरत नहीं, तो मसीहा के सिद्धांत के लिए

एजेंट की कैसी जरूरत। ख्3,

ईसाई मिशनों के कार्य के बारे में वह कहते हैंः

III. मिशनरी सामाजिक कार्य को निष्काम भाव से नहीं करते, अपितु वह तो

सामाजिक सेवा प्राप्त करने वालों के उद्धार का एक साधन है। ख्1, .... जब

  1. हरिजन, 1936, पृ. 330

  2. वही, 1936, पृ. 353

  3. वही, अप्रैल, 1937, पृ. 86