2
वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
I
हिंदू समाज-संगठन में क्या कोई विलक्षणता है? साधारण हिंदू जिसे शोधकर्ताओं के शोध की जानकारी नहीं है, वह तो यही कहेगा कि उसके समाज-संगठन में तो कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे विलक्षण, असाधारण या अस्वाभाविक कहा जा सके। यह स्वाभाविक भी है। जो लोग अकेलेपन में अपना जीवन बिताते हैं, उन्हें अपने तौर-तरीकों की विलक्षणता के बारे में जानकारी ही नहीं होती है। लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले जा रहे हैं। लेकिन हिंदू जो हिंदू नहीं हैं, बाहर वाले हैं, उन्हें हिंदू समाज-संगठन कैसा लगता है? क्या उन्हें वह सहज एवं स्वाभाविक लगा?
कोई 305 ई.पू. के लगभग ग्रीक राजा सेल्यूकस निकातोर का राजदूत मेगस्थनीज भारत में चंद्रगुप्त मौर्य के राज-दरबार में आया था। उसे हिंदू समाज-संगठन अत्यंत विलक्षण लगा। अन्यथा वह इतने गहन ध्यान से हिंदू समाज-संगठन की निराली बातों का उल्लेख न करता। उसने लिखा हैः
भारत के लोग सात वर्गों में बंटे हुए हैं। क्रम की दृष्टि से पुरोहित का वर्ग
सर्वप्रथम है, पर संख्या की दृष्टि से उनका सबसे छोटा वर्ग है। लोग उनकी सेवाओं
का लाभ यज्ञ अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर उठाते हैं सार्वजनिक
रूप से उन्हें राजा बृहद धर्म सभा में आमंत्रित करते हैं। वर्ष के प्रारंभ में सभी
पुरोहित महल के द्वार पर एकत्र होते हैं। इस अवसर पर एक-एक कर पुरोहित
सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं - मैंने अमुक ग्रंथ लिखा है या मैंने फसल
और पशु-संवर्धन के लिए अमुक आविष्कार किया है या मैंने लोक-कल्याण के
लिए विधि खोज निकाली है। यदि किसी के बारे में तीन बार यह पता चलता है
कि उसने कोई गलत सूचना दी है तो कानून में उसे दंड दिए जाने का विधान