28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि वह शेष जीवन-भर मौन रहे। लेकिन जो भौतिक सलाह देता है, उसे कर आदि देने से मुक्त कर दिया जाता है।
दूसरा वर्ग कृषिकर्मियों का है। वे बहुसंख्यक हैं। ये अति विनम्र होते हैं। वे सेना में भर्ती होने से मुक्त होते हैं। वे निडर भाव से खेती-बाड़ी करते हैं। वे न तो नगर में वहां के कार्यकलापों में भाग लेने के लिए और न ही किसी अन्य प्रयोजन से वहां कभी जाते हैं। अतः बहुधा ऐसा होता है कि देश के एक ही भाग में एक ही अवधि में लोग युद्ध-क्षेत्र मे अपनी जान की परवाह न करते हुए लड़ रहे होते हैं, तो उसके अति निकट ही दूसरे लोग इन सैनिकों के संरक्षण में निडर होकर हल चला रहे होते हैं संपूर्ण भूमि राजा की संपत्ति होती है। किसान उसे इस शर्त पर जोतता है कि उसे उपज का एक चौथाई भाग प्राप्त होगा।
तीसरा वर्ग पशुपालकों और शिकारियों का है। शिकार करने, पशुपालन करने और भार ढोने वाले पशुओं को बेचने या मंगनी पर देने की अनुमति केवल उन्हीं की होती है। फसल को नष्ट करने वाले पशु-पक्षिओं से खेती की रक्षा करने के बदले में उन्हें राजा उन्हें अनाज देता है। वे घुमक्कड़ होते हैं और तंबुओं में रहते हैं।
पशुपालकों और शिकारियों के बाद चौथा वर्ग उन लोगों का है, जो व्यापार करते हैं, बर्तन आदि बेचते हैं और शारीरिक श्रम करते हैं। इनमें से कुछ कर अदा करते हैं और कुछ राज्य द्वारा निर्दिष्ट सेवाएं करते हैं। लेकिन शस्त्रास्त्र और जहाजों का निर्माण करने वाले लोग वेतन और रसद राजा से प्राप्त करते हैं, जिसके अधीन वे काम करते हैं। सेनापति सैनिकों को शस्त्रास्त्रों को सप्लाई करते हैं। पोताध्यक्ष यात्री तथा माल ढोने के लिए जहाजों को किराए पर देते हैं।
पांचवां वर्ग युद्ध करने वालों का है। जब वे युद्ध-क्षेत्र में नहीं होते, तब वे कोई काम नहीं करते और आमोद-प्रमोद में अपना जीवन बिताते हैं। उनका
खर्च राजा उठाता है। अतः जब भी अवसर आता है, तब वे तुरंत युद्ध के लिए कूच करते हैं, क्योंकि अपने शरीर के अतिरिक्त उनके पास कोई भी माल-मता नहीं होता।
छठा वर्ग निरीक्षकों का है। उनका काम खोज-खबर करना और राजा को गुप्त रूप से सारे समाचार देते रहना है। कुछ को नगर और कुछ को सेना के संबंध में सूचना लाने का काम सौंपा जाता है। नगर-निरीक्षक और सेना-निरीक्षक अपने कार्यों में क्रमशः नगर-वासियों और सेना के सैनिकों का आमोद-प्रमोद