410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उतनी निकटता का अनुभव वह महाराष्ट्र के भारतीय ईसाई से नहीं करता। संक्षेप में, भारतीय ईसाई पद केवल एक संख्यावाची पद है। इस पद के पीछे कोई सामुदायिक भावना नहीं है। भारतीय ईसाई परस्पर वैसी चेतना से आबद्ध नहीं हैं, जो समुदाय के अस्तित्व की कसौटी होती है।
भारत के ईसाइयों का जीवन जिन कमजोरियों से ग्रस्त है, उनके बारे में मैंने जो कहा है, पता नहीं कि उसके बारे में वे क्या सोचेंगे। पर एक बात मैं कह सकता हूं। वह यह है कि भारत के ईसाइयों के प्रति मेरी गहन रुचि है, क्योंकि उनमें से अधिकांश अस्पृश्य वर्गों के हैं। मेरे विचार एक मित्र के विचार हैं। वह शत्रु की निंदा नहीं है। मैंने उनकी कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया है, क्योंकि मैं उन्हें बलवान देखना चाहता हूं। मैं उन्हें बलवान इसलिए बनाना चाहता हूं कि क्योंकि मैं भविष्य में उनके लिए भारी खतरा देख रहा हूं। उन्हें ईसाई धर्म के प्रति झीने आवरण में लिपटे श्री गांधी के उस विरोध से निपटना है, जो अपनी जड़ें भारत की सामाजिक संरचना में जमा रहा है। लेकिन उन्हें तीखे तेवर वाले हिंदू धर्म का भी सामना करना है, जो भारतीय राष्ट्रवाद का छद्म रूप धारण कर रहा है। तीखे तेवर वाला हिंदू धर्म ईसाइयों तथा ईसाई धर्म से कैसा व्यवहार करेगा, उसका अनुमान अभी हाल की वृंदावन की घटना से लगाया जा सकता है। यदि समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचार1 सही है तो उसके अनुसार, उदार हिंदू धर्म के अनुयायियों की एक भीड़ ने चुपचाप जाकर वृंदावन स्थित मिशन की इमारत को भस्म कर दिया। उसने मिशनरी को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने उसे पुनः बनवाया तो वे पुनः जाएंगे और उसे भस्म कर देंगे। हो सकता है कि यह गुमराह देशभक्तों का एकाकी उदाहरण हो अथवा हो सकता है कि वह केवल हिंदुओं की उस योजना का एक नमूना-भर हो, जिसके द्वारा वे ईसाइयों और ईसाई धर्म से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हों। यदि यह भावी घटनाओं का संकेत है तो निश्चय ही उसका मुकाबिला करने के लिए ईसाइयों को तैयार रहना चाहिए। उसका मुकाबिला तो वे तभी कर सकते हैं, जब वे मेरे द्वारा बताई गई कमजोरियों को दूर कर दें। इसके अलावा क्या कोई अन्य उपाय है? मेरी कामना है कि भारत के सभी ईसाई उस पर गौर करें।
- इंडियन विटनेस